औरतों ने बदली दुनिया

आप क्या सीखेंगे

आज के स्कूल और शिक्षा: आज कई लड़के और लड़कियाँ स्कूल जाते हैं। लेकिन आज भी शिक्षा के मामले में लड़के और लड़कियों के बीच अंतर है। ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के बीच ड्रॉपआउट रेट बहुत अधिक है, यानि अधिकाँश लड़कियाँ अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं। इसके लिए परिवार और समाज जिम्मेदार है। लड़कियों को अक्सर घर संभालने और बुजुर्गों और भाई बहनों की देखभाल का जिम्मा दे दिया जाता है। इसके अलावा स्कूलों की खस्ताहाल स्थिति और शौचालय के अभाव के कारण भी लड़कियाँ एक खास उम्र के बाद स्कूल जाना बंद कर देती हैं।


साक्षरता दर प्रतिशत में
जनगणनापुरुषमहिलाएँ
19604015
20017654
20118265

इस टेबल में पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता दर को दिखाया गया है। 2011 की जनगणना से पता चलता है कि लोगों में साक्षरता दर बढ़ी है। लेकिन आज भी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की साक्षरता दर काफी कम है। हर समुदाय और वर्ग के लोगों तक, खासकर लड़कियों के लिए स्कूल की सुविधा देना आज भी एक बड़ी चुनौती है। भारत सरकार द्वारा कराए गए शिक्षा सर्वे (2003-2004) से यह निष्कर्ष निकलता है कि

जनसंख्या के आँकड़ों से यह पता चलता है कि अनुसूचित जाति/जनजाती की तुलना में मुसलमान लड़कियों में स्कूल ड्रॉपआउट रेट अधिक है। गैर-मुसलमान लड़की औसतन चार वर्ष बाद स्कूल छोड़ देती है, जबकि मुसलमान लड़की औसतन तीन वर्ष तक ही स्कूल जा पाती है।

स्कूल छोड़ने का कारण

दलित, आदिवासी और मुसलमान

स्कूल और टीचर की कमी: देश के कई हिस्सों (खासकर ग्रामीण इलाकों में‌) स्कूलों और कुशल शिक्षकों की भारी कमी है।

पहुँच से दूर: यदि स्कूल किसी के घर के पास नहीं है, और दूर स्थित स्कूल जाने के लिए बस या वैन जैसे साधन नहीं हैं तो लोग अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से परहेज करते हैं।

महँगाई: कई लोग इतने गरीब होते हैं कि पढ़ाई के खर्चे को उठाना उनके वश की बात नहीं होती है। ऐसी स्थिति में लड़कियों को घर पर रहने दिया जाता है और लड़कों को पढ़ाई के लिए प्रश्रय दिया जाता है।

भेदभाव: शिक्षकों और सहपाठियों द्वारा भेदभाव से भरा व्यवहार भी इसके लिए जिम्मेदार है। आपने पिछले एक पाठ में दिए गए ओमप्रकाश वाल्मीकि के अनुभव से यह जाना होगा।


महिला आंदोलन

अब स्थितियाँ बदल रही हैं। लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा का अधिकार मिल गया है। पुराने जमाने की तुलना में लोगों की मानसिकता भी बदली है। यह सबकुछ रातोंरात नहीं हुआ है, बल्कि महिलाओं के सतत संघर्ष का परिणाम है। इस संघर्ष को महिला आंदोलान का नाम दिया जाता है। कई महिलाओं ने व्यक्तिगत रूप से और कई महिला संगठनों ने इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया है। इस आंदोलन को कई पुरुषों का समर्थन भी मिला है। जीवन के दूसरे पहलुओं पर भी (कानूनी सुधार, हिंसा, स्वास्थ्य, महिलाओं की स्थिति) पर भी सुधार आये हैं। भेदभाव के खिलाफ और न्याय के लिए लड़ाई, महिला आंदोलन का अभिन्न अंग रही है। इस प्रचार का असर नीचे दिया गया है।

नये कानून: काफी प्रचार के बाद नये कानून बने। 2006 में घरेलू हिंसा पर कानून बना। इस कानून ने महिलाओं के घरेलू हिंसा से कानूनी सुरक्षा प्रदान की है।

यौन शोषण: 1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने दफ्तरों, फैक्ट्रियों और शैक्षणिक संस्थानों में यौन हिंसा से महिलाओं को सुरक्षित रखने के लिए गाईडलाइन जारी किया था।

दहेज विरोधी कानून: 1980 के दशक में दहेज हत्या के खिलाद पूरे देश में अभियान चले थे। दहेज हत्या के दोषी लोगों के खिलाफ सही कदम नहीं उठाए जाने के कारण महिला संगठन अपनी आवाज उठा रहा था। इन संगठनों के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए थे, कोर्ट गए थे और अन्य जरूरी काम किए थे। दहेज उत्पीड़न के खिलादफ अखबारों में और समाज में भी गुसा दिखने लगा था। इन सबके परिणामस्वरूप दहेज उत्पीड़न के खिलाफ कानून बना।



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