लड़के और लड़कियाँ

आप क्या सीखेंगे

हममें से हर कोई अक्सर लिंग के बारे में सुनता है। यह एक ऐसी पहचान है जिससे हम हर रोज रूबरू होते हैं। इससे कई बातें तय होती हैं, जैसे कि हम कौन हैं, हम क्या बनेंगे, हम कहाँ जा सकते हैं या नहीं जा सकते हैं, आदि। लैंगिक पहचान के बारे में हमारी समझ हमारे परिवार और समाज पर आधारित होती है। लेकिन दुनिया के विभिन्न समुदायों में लिंग पर आधारित भूमिकाओं के मायने विभिन्न हो सकते हैं। अधिकतर समाजों में पुरुष और स्त्री को अलग अलग दर्जा दिया जाता है।


लड़के और लड़कियों के बीच अंतर

समाज में लड़के और लड़कियों के साथ अलग अलग व्यवहार होता है। यह भेदभाव छोटी उम्र से ही शुरु हो जाता है। इनमें से कुछ के बारे में आगे बताया गया है।

खिलौने: लड़के और लड़कियों को अलग-अलग खिलौने दिए जाते हैं। खिलौने के चयन से शायद यह बताने की कोशिश होती है कि जब वे बड़े होकर पुरुष और महिला बनेंगे तो उनका भविष्य कैसा होगा।

पोशाक: लड़कों की पोशाक और लड़कियों की पोशाक अलग अलग तरह की होती है। लड़के अक्सर निक्कर और शर्ट पहनते हैं, जबकि लड़कियाँ स्कर्ट और फ्रॉक पहनती हैं। थोड़ा बड़े होने पर लड़के पतलून पहनते हैं, जबकि लड़कियाँ सलवार समीज पहनती हैं।

बातचीत का तरीका: लड़कियों से कहा जाता है कि वे दबी आवाज में बात करें। दूसरी ओर, लड़कों से कहा जाता है कि वे रोबीली आवाज में बात कर सकते हैं। लड़कों को ताकवर दिखना होता है जबकि लड़कियों को कमजोर दिखना होता है।

ऊपर बताई गई भिन्नताओं से यह भी तय होता है कि बड़ा होकर कोई किस विषय की पढ़ाई करेगा और किस क्षेत्र में अपना करियर बनाएगा। लड़के अक्सर विज्ञान या कॉमर्स की पढ़ाई करते हैं जबकि लड़कियाँ अक्सर समाज शास्त्र, इतिहास, आदि पढ़ती हैं।

घरेलू कामकाज का महत्व

पूरी दुनिया में घरेलू कामकाज और परिवार की देखभाल की मुख्य जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर होती है। घर के कामकाज के लिए मल्टिटास्किंग की जरूरत पड़ती है। लेकिन घरेलू काम काज को असली काम का दर्जा नहीं दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसकी क्षमता महिलाओं में नैसर्गिक रूप से होती है। इसलिए उन्हें घरेलू कामकाज के एवज में कोई वेतन नहीं मिलता है।

घरेलू नौकरों की स्थिति

कई घरों में दाई नौकर रखने का प्रचलन है। खासकर से शहरों में ऐसा अधिक दिखता है। घर में काम करने वाली महरी या नौकर कई तरह के काम करते हैं, जैसे कि बरतन धोना, कपड़े धोना, झाड़ू-पोंछा, खाना पकाना, आदि। घरेलू कामकाज के लिए अधिकतर महिलाओं को रखा जाता है। कभी कभी कम उम्र के लड़के या लड़की को भी इस काम के लिए रखा जाता है।

घरेलू कामकाज को बहुत महत्व नहीं दिया जाता है, इसलिए दाई या नौकर का वेतन बहुत कम होता है। कामवाली महरी का काम सुबह के पाँच बजे शुरु हो जाता है और कई मामले में उसका काम आधी रात को जाकर समाप्त होता है। इतनी मेहनत करने के बावजूद उनके साथ अक्सर दुर्व्यवहार होता है और उन्हें विषम परिस्थितियों में रहना पड़ता है।


महिलाओं के लिए चुनौतिआँ

महिलाओं को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिसे हम साधारण काम समझते हैं उसमें घोर शारीरिक श्रम लगता है। महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कामों की लिस्ट इस प्रकार है।

इन कामों में भारी वस्तु उठाना और उसे ढ़ोना तथा बार बार झुकना शामिल होता है। खाना पकाते समय तपते चूल्हे के पास घंटों खड़ा होना पड़ता है। इससे यह पता चलता है कि केवल पुरुषों का काम ही थकाऊ नहीं होता, बल्कि महिलाओं का काम भी थका देने वाला होता है।

घरेलू काम काज में बहुत समय लगता है। यदि कोई महिला बाहर भी काम पर जाती है तो उसे कुल मिलाकर कई घंटे काम करना पड़ता है। ऐसे में खाली समय एक विलासिता की बात हो जाती है।

महिलाओं का काम और असमानता

महिलाओं के काम को कम महत्व देना दरअसल समाज में पुरुष और महिला के बीच की असमानता की परिपाटी का एक हिस्सा है। ऐसा सदियों से चला आ रहा है। इसके समाधान के लिए परिवार के स्तर पर और सरकार के स्तर पर बहुत काम करने की जरूरत है।

समानता सुनिश्चित करने में सरकार की भूमिका

हमारे संविधान में समानता को बहुत महत्व दिया गया है। लेकिन असल जिंदगी में लिंग पर आधारित असमानता व्याप्त है। सरकार को इसका कारण समझना होगा और इसके समाधान के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे। सरकार को पता है कि घर और बच्चों को संभालने की कितनी बड़ी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर होती है। इससे यह तय होता है कि लड़की स्कूल जा पाती है या नहीं, महिला काम पर जा पाती है या नहीं, और जाती है तो किस तरह के काम करती है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं।



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