प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन

आप क्या सीखेंगे:

संसाधनों के मैनेजमेंट की जरूरत

हमारे काम आने वाली ज्यादातर चीजें हमें पृथ्वी से मिलती हैं। सूर्य की रोशनी एकमात्र ऐसा संसाधन है जो पृथ्वी के बाहर से आता है। लेकिन सूर्य की रोशनी को हमारे लिये उपयोगी बनाने काम भी पृथ्वी पर ही होता है।

सीमित संसाधन: धरती पर संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। इसलिये हमें संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल के बारे में सोचने की जरूरत है। यदि हम संसाधनों का दोहन करना जारी रखेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिये कुछ भी नहीं बचेगा।

समान वितरण: संसाधनों का प्रबंधन इस तरह से करना चाहिए कि यह कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथों में न रह जाये। संसाधनों के समान रूप से वितरण की आवश्यकता है। हर व्यक्ति का संसाधनों पर समुचित अधिकार होना चाहिए।

पर्यावरण को नुकसान: संसाधनों के दोहन से पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। हमें ऐसे तरीके खोजने होंगे ताकि पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो।


फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ

जंगल बायोडाइवर्सिटी के हॉट स्पॉट होते हैं। किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में बायोडाइवर्सिटी को नापने के लिये उस क्षेत्र में स्पेशीज की संख्या को लिया जा सकता है।

स्टेकहोल्डर

जो लोग सीधे या परोक्ष रूप से वन पर निर्भर रहते हैं उन्हें स्टेकहोल्डर कहा जाता है। जो लोग फॉरेस्ट के मैनेजमेंट को प्रभावित करते हैं वे भी स्टेकहोल्डर होते हैं। वनों के मुख्य स्टेकहोल्डर इस प्रकार हैं।

जंगल और उसके आस पास रहने वाले लोग: जो लोग जंगल और उसके आस पास रहते हैं वे जंगल से कई चीजें इस्तेमाल करते हैं। उन्हें ईंधन के लिये लकड़ी की जरूरत पड़ती है। वे भोजन के लिये कुछ जानवरों का शिकार करते हैं। वे घर बनाने के लिये जंगल से सूखी पत्तियाँ, टहनियाँ और लकड़ी लेते हैं। वे पारंपरिक दवाएँ बनाने के लिये कई जड़ी बूटियाँ लेते हैं। वे अपने मवेशियों को चराने के लिये जंगल में ले जाते हैं। इस तरह के लोग जंगल से केवल उतना ही लेते हैं जितने की उनको जरूरत है। इसलिये स्थानीय लोगों द्वारा जंगल से चीजें लेने से बायोडाइवर्सिटी को कोई नुकसान नहीं होता है।

वन विभाग: इस विभाग का गठन सबसे पहले ब्रिटिश शासकों ने किया था। अंग्रेजी शासकों ने स्थानीय लोगों द्वारा जंगल से संसाधन इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। अंग्रेजों ने निर्ममतापूर्वक जंगलों का दोहन किया था। वे मोनोकल्चर प्लांटेशन को अपनाते थे; और केवल यूकेलिप्टस, पाइन और टीक के पेड़ों को लगाते थे। इससे बायोडाइवर्सिटी पर बुरा असर पड़ता था। आजादी के बाद भी नई सरकारों ने फॉरेस्ट मैनेजमेंट के लिये ब्रिटिश पॉलिसी का अनुसरण किया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। वन विभाग नई नीतियाँ बना रहा है ताकि स्थानीय लोगों को कटकर नहीं रहना पड़े। नये फॉरेस्ट लॉ अब वन संपदा के दोहन की बजाय संरक्षण पर अधिक जोर दे रहे हैं।

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क: वन संरक्षण कार्यक्रम के कारण स्थानीय लोग किस तरह वन से कट जाते हैं इसका बहुत अच्छा उदाहरण ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के केस में देखने को मिलता है। पहले बंजारे लोग हर जाड़े में अपनी भेड़ों को लेकर घाटियों में जाया करते थे। घाटी में भेड़ों के लिये प्रचुर मात्रा में घास उपलब्ध रहती थी। गर्मी में ये लोग घाटी से पहाड़ों में चले जाते थे। इससे घास को फिर से बढ़ने के लिये पूरा समय मिल जाता था। लेकिन जब इन लोगों के चारागाहों में आने पर प्रतिबंध लग गया, तो घास तेजी से बढ़ती थी। लंबी घास के कारण इन चारागाहों में घास की नई फसल नहीं बढ़ पाती थी। इससे चारागाहों को काफी नुकसान होने लगा। जब इन बंजारों को फिर से इस नेशनल पार्क में आने कि अनुमति मिली तो घास की बढ़त फिर से सही ढ़ंग से होने लगी।


उद्योगपति: जो उद्योगपति कच्चे माल के लिये वन पर निर्भर करते हैं वे शायद संरक्षण में विश्वास नहीं रखते हैं। उनके पास इतने संसाधन होते हैं कि कच्चे माल के लिये किसी दूसरे क्षेत्र में जा सकते हैं। अपनी मजबूत लॉबी से वे सरकार की नीतियों को भी प्रभावित कर सकते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग जंगल में रहने प्राणियों के भले के लिये शायद ही सोचते हैं।

नेचर और वाइल्डलाइफ प्रेमी: ऐसे लोग जंगल से कोई मूर्त चीज भले ही न लेते हों लेकिन वन संरक्षण में ये अहम भूमिका निभाते हैं। स्थिति यह है कि संरक्षण के लिये उठाये गये कई कदम इन्हीं नेचर और वाइल्डलाइफ प्रेमियों के कारण संभव हो पाये हैं। आज कई गैर सरकारी संस्थान (NGO) वनों के संरक्षण के लिये काम कर रहे हैं।

वन्य जीव संरक्षण के लिये अमृता देवी बिश्नोई नेशनल अवार्ड: राजस्थान के बिश्नोई समुदाय के लोगों ने हमेशा से वन और वन्यजीवों के संरक्षण के लिये काम किया है। उनकी धार्मिक मान्यताओं के कारण ऐसा संभव हो पाया है। अमृता देवी एक महिला का नाम है जो राजस्थान के जोधपुर शहर के निकट खेजराली गाँव के बिश्नोई समुदाय की थीं। खेजरी के वृक्षों की रक्षा करते हुए वह शहीद हो गईं थीं। यह घटना 1731 में हुई थी। उसी महिला के सम्मान में यह पुरस्कार दिया जाता है।

सस्टेनेबल मैनेजमेंट

जब संसाधनों का इस्तेमाल इस तरीके से होता है कि लंबे समय तक संसाधनों की सप्लाई बनी रहे तो इसे सस्टेनेबल मैनेजमेंट कहते हैं। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि आने वाली कई पीढ़ियों तक संसाधन मिलते रहें।

चिपको आंदोलन: संसाधन के प्रबंधन में स्थानीय लोगों की भागीदारी का एक अच्छा उदाहरण है चिपको आंदोलन। यह आंदोलन 1970 के दशक में आधुनिक उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के रेनी गाँव में शुरु हुआ था। जब ठेकेदार के मजदूर पेड़ काटने आये तो रेनी गाँव की औरतें पेड़ों से चिपक गईं ताकि उन्हें कटने से बचा सकें। धीरे धीरे यह आंदोलन भारत के दूसरे भागों में भी फैल गया। इससे टिम्बर माफिया द्वारा जंगलों की अंधाधुंध कटाई पर लगाम लगाना संभव हो पाया।

अराबाड़ी वन: यह जंगल पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में है। इस क्षेत्र के साल के वनों की हालत दयनीय थी। 1970 के दशक में एक दूरदृष्टि वाले फॉरेस्ट ऑफिसर ने इस जंगल की कमान संभाली। उसने 1272 हेक्टेअर में फैले साल के जंगल की देखभाल के लिये वहाँ के गाँव वालों को लगा दिया। उसके बदले में गाँव वालों को जंगल की देखभाल में रोजगार दिया गया और जंगल की कटाई का भी काम दिया गया। उन्हें फसल का 25% हिस्सा भी दिया गया। एक मामूली फीस देकर वे चारा और जलावन भी ले सकते थे। स्थानीय लोगों की भागीदारी से वहाँ का कायापलट हो गया। जिस जंगल की कभी कोई कीमत नहीं थी वह 1983 आते आते 12.5 करोड़ रुपये का हो गया।


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