इलेक्ट्रिसिटी

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इलेक्ट्रिक करेंट और सर्किट

इलेक्ट्रिक करेंट: किसी कंडक्टर के क्रॉस सेक्शन से होकर प्रति यूनिट समय में बहने वाले इलेक्ट्रिक चार्ज को इलेक्ट्रिक करेंट कहते हैं। यदि Q इलेक्ट्रिक चार्ज है और t समय है तो इलेक्ट्रिक करेंट I को निम्नलिखित इक्वेशन द्वारा दिया जा सकता है:

I = Q/t

flow of electrons and flow of electric charge in a circuit

इलेक्ट्रिक चार्ज का SI यूनिट कूलॉम्ब है। एक कूलॉम्ब का चार्ज 6 X 108 इलेक्ट्रॉन पर रहने वाले चार्ज के बराबर है। इलेक्ट्रिक करेंट का SI यूनिट एम्पियर है। यह नाम फ्रांसीसी वैज्ञानिक आंद्रे मैरी एम्पियर (1775 – 1836) के सम्मान में रखा गया है। यदि 1 C चार्ज किसी क्रॉस सेक्शन से 1 सेकंड में बहता है तो इसमें 1 एम्पियर करेंट होता है।

1A = 1C/1s

इलेक्ट्रिक करेंट को आमीटर नाम के इंस्ट्रुमेंट से मापा जाता है। आमीटर को सर्किट में हमेशा सीरीज में कनेक्ट किया जाता है। करेंट की छोटी मात्रा के लिये माइक्रोएम्पियर और मिलीएम्पियर का इस्तेमाल होता है।

1 mA = 10-3 A
1 µA = 10-6 A

इलेक्ट्रिक सर्किट: जिस बंद पथ से इलेक्ट्रिक करेंट बहता है उसे इलेक्ट्रिक सर्किट कहते हैं। एक क्लोज सर्किट एक कम्प्लीट सर्किट होता है और करेंट केवल क्लोज सर्किट से होकर बहता है। ओपन सर्किट से करेंट का फ्लो नहीं हो सकता है। इलेक्ट्रिक स्विच एक उपकरण होता है जिससे किसी सर्किट को ओपन या क्लोज किया जाता है।

इलेक्ट्रिक पोटेंशियल और पोटेंशियल डिफरेंस

पोटेंशियल डिफरेंस: किसी सर्किट में एक यूनिट चार्ज को एक प्वाइंट से दूसरे प्वाइंट तक मूव करने में होने वाले कार्य को पोटेंशियल डिफरेंस कहते हैं। किसी कंडक्टर से करेंट का फ्लो कराने के लिये जरूरी पोटेंशियल डिफरेंस इलेक्ट्रिक सेल या किसी अन्य स्रोत से आता है।

पोटेंशियल डिफरेंस = कार्य/चार्ज

या, V = W/Q

पोटेंशियल डिफरेंस का SI यूनिट वोल्ट है। यह नाम इटालियन वैज्ञानिक अलेसांद्रो वोल्टा (1745 – 1827) के सम्मान में रखा गया है। 1 C चार्ज को किसी कंडक्टर में दो प्वाइंट के बीच कैरी करने में लगा 1 J कार्य एक वोल्ट के बराबर होता है।

1V= 1 J/1C
या, 1 V=1J C-1

पोटेंशियल डिफरेंस को मापने के लिये वोल्टमीटर नाम का उपकरण इस्तेमाल किया जाता है। वोल्टमीटर को किसी कंडक्टर में उन दो प्वाइंट के पैरेलल लगाया जाता है जिनके बीच का पोटेंशियल डिफरेंस मापना होता है।


सर्किट डायग्राम

किसी सर्किट डायग्राम में विभिन्न सिम्बॉल की सहायता से इलेक्ट्रिक सर्किट को दिखाया जाता है। सर्किट डायग्राम से उस डायग्राम को इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति को सहूलियत होती है; क्योंकि विभिन्न कॉम्पोनेंट को दिखाने के लिये एक तय कंवेंशन का इस्तेमाल किया जाता है।

ओम का नियम

जर्मनी के वैज्ञानिक जॉर्ज साइमन ओम ने इलेक्ट्रिक करेंट और पोटेंशियल डिफरेंस के बीच के संबंध को बताया था। ओम का नियम निम्नलिखित है:

"एक स्थिर तापमान पर किसी इलेक्ट्रिक सर्किट में किन्हीं दो प्वाइंट के बीच का पोटेंशियल डिफरेंस उससे होकर फ्लो करने वाले करेंट के सीधे अनुपात में होता है।"

electric current vs potential difference graph

V ∝ I
Or, V/I = R
Or, V = IR
Or, I = V/R

यहाँ पर R प्रोपोर्शनलिटी का कॉन्सटैंट है जिसे रेसिस्टेंस कहते हैं। किसी भी दिये गये धातु के लिये रेसिस्टेंस का मान कॉन्सटैंट होता है। हर कंडक्टर इलेक्ट्रिक चार्ज के फ्लो का विरोध करता है। उसकी इस क्षमता को रेसिस्टेंस कहते हैं। रेसिस्टेंस का SI यूनिट ओम (Ω) होता है। जब किसी कंडक्टर से 1 A करेंट फ्लो करता है और पोटेंशियल डिफरेंस 1 V रहता है तो रेसिस्टेंस का मान 1 ओम होता है।

1Ω = 1V/1A

ऊपर दिये गये इक्वेशन से यह भी पता चलता है कि किसी कंडक्टर से फ्लो करने वाला करेंट उसके रेसिस्टेंस के उलटे अनुपात में होता है। जिस पदार्थ का रेसिस्टेंस कम होता है उसे गुड कंडक्टर कहते हैं। जिस पदार्थ का रेसिस्टेंस अधिक होता है उसे बैड कंडक्टर कहते हैं। जिस पदार्थ का रेसिस्टेंस बहुत अधिक होता है उसे इंसुलेटर कहते हैं।


किसी कंडक्टर के रेसिस्टेंस को प्रभावित करने वाले कारक

किसी कंडक्टर का रेसिस्टेंस निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:

किसी कंडक्टर का रेसिस्टेंस उसकी लंबाई के सीधे अनुपात में और उसके क्रॉस सेक्शन के एरिया के उलटे अनुपात में होता है। यदि लंबाई l है और क्रॉस सेक्शन का एरिया A है तो;

R ∝ l
And, R ∝ 1/A
Or, R ∝ l/A
Or, R = ρ l/A

यहाँ पर, ρ(rho) प्रोपोर्शनलिटी का कॉन्सटैंट है जिसे कंडक्टर के पदार्थ की रेसिस्टिविटी कहते हैं। रेसिस्टिविटी का SI यूनिट ओम मीटर (Ωm) होता है।

मेटल और एलॉय की रेसिस्टिविटि काफी कम होती है, जो 10-8 Ω से 10-6 Ω के रेंज में होती है। जिन पदार्थ की रेसिस्टिविटी काफी कम होती है वे इलेक्ट्रिसिटी के गुड कंडक्टर होते हैं। इंसुलेटर की रेसिस्टिविटी अधिक होती है, जो 1012 से 1017 Ω की रेंज में होती है। किसी भी पदार्थ का रेसिस्टेंस और रेसिस्टिविटी तापमान के अनुसार बदलता है।

एलॉय की रेसिस्टिविटी उसके कॉम्पोनेंट मेटल की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा उच्च तापमान पर भी एलॉय का ऑक्सिडेशन नहीं होता है। इसलिये हीटिंग डेवाइस के एलेमेंट में एलॉय का इस्तेमाल होता है।


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