भारतीय संविधान

संविधान की जरूरत

दुनिया के अधिकांश देशों के पास एक संविधान होता है। संविधान कई उद्देश्यों को पूरा करता है। सबसे पहले यह उन आदर्शों को तय करता है जिनपर किसी देश के नागरिक चलने की इच्छा रखते हैं। संविधान किसी देश के समाज के मौलिक रूप को बताता है। किसी भी देश में अक्सर कई समुदायों के लोग रहते हैं। यह जरूरी नहीं कि ये लोग हर मुद्दे पर सहमत हों। संविधान कुछ कानूनों और सिद्धांतों को बनाता है ताकि लोग इस बात पर सहमत हों कि देश में किस तरह की शासन व्यवस्था रहेगी।

देश के राजनैतिक तंत्र को परिभाषित करना संविधान का दूसरा उद्देश्य है। इसे समझने के लिए हमारे पड़ोसी देश नेपाल का उदाहरण लेते हैं। कुछ वर्षों पहले तक नेपाल में राजतंत्र हुआ करता है। उसके बाद वहाँ के लोगों ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था अपनाने का फैसला लिया और एक नया संविधान लागू किया।


संविधान के मुख्य लक्षण

भारत में लंबे समय तक चलने वाले अंग्रेजी राज के कारण लोगों को यह बात समझ में आने लगी थी कि आजाद भारत में एक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था होनी चाहिए। लोग ऐसा इसलिए चाहते थे कि उनकी इच्छा थी कि हर नागरिक को समान अधिकार मिले और हर नागरिक को सरकार में शामिल होने का मौका मिले। भारत के संविधान के कुछ मुख्य लक्षण नीचे दिए गए हैं।

संघवाद: इसका मतलब है कि भारत में शासन के एक से अधिक स्तर हैं। हमारे देश में राज्य स्तर और केंद्रीय स्तर पर अलग अलग सरकारें हैं। पंचायती राज तीसरे स्तर की सरकार का नाम है। राज्य सरकारों को कुछ मुद्दों पर स्वायत्तता मिली हुई है, जबकि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर केंद्र सरकार का अधिकार होता है। भारत के हर नागरिक पर विभिन्न स्तर की सरकारों के बनाए नियम लागू होते हैं।

संसदीय शासन पद्धति: हर स्तर की सरकार का गठन जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता है। भारत के संविधान ने हर वयस्क नागरिक को मताधिकार प्रदान किया है। इस तरह से भारत के नागरिकों की अपने प्रतिनिधि चुनने में सीधी भूमिका होती है। इसके अलावा, हर नागरिक को (चाहे वह किसी भी सामाजिक पृष्ठभूमि से हो) चुनाव लड़ने का अधिकार मिला हुआ है।


शक्तियों का बँटवारा: संविधान के अनुसार, सरकार के तीन अंग हैं। इन अंगों के नाम हैं विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। विधायिका का गठन जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से होता है। कार्यपालिका में वे लोग आते हैं तो कानूनों को लागू करने और सरकार चलाने का काम करते हैं। कोर्ट के सिस्टम को न्यायपालिका कहते हैं। संविधान ने सरकार के तीनों अंगों को अलग-अलग शक्तियाँ प्रदान की हैं ताकि कोई भी एक अंग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न कर सके। इस तरह से सरकार का हर अंग दूसरे अंग पर अंकुश रखता है और तीनों अंगों के बीच सत्ता का संतुलन बना रहता है।

मौलिक अधिकार: मौलिक अधिकारों को अक्सर भारतीय संविधान की अंतरात्मा माना जाता है। मौलिक अधिकार, नागरिकों को सरकार द्वारा शक्तियों के मनमाने दुरुपयोग से बचाते हैं। इस तरह से संविधान यहाँ के नागरिकों के अधिकारों की सरकार से और अन्य नागरिकों से सुरक्षा की गारंटी देता है। संविधान अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बहुसंख्यकों से सुरक्षा की भी गारंटी देता है।

इसके अलावा हमारे संविधान में एक खंड नीति निर्देशक तत्वों (डायरेक्टिव प्रिंसिप्ल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी) का भी है। संविधान सभा के सदस्यों ने इस खंड को इसलिए बनाया था तकि सामाजिक और आर्थिक सुधार बेहतर तरीके से हो सकें। इसे इस उद्देश्य से भी बनाया गया था ताकि स्वतंत्र भारत में सरकारों द्वारा जनता की गरीबी हटाने के लिए उचित कानून और नीतियाँ बन सकें।

धर्मनिरपेक्षता: जिस राज्य में किसी भी धर्म को राजकीय धर्म का दर्जा नहीं दिया जाता है और हर धर्म को एक समान माना जाता है उसे धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं।

मौलिक अधिकारों की लिस्ट:



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