पदार्थों का पृथक्करण

हमारे दैनिक जीवन में कई बार हमें किसी मिश्रण से उपयोगी पदार्थ को अलग करने की जरूरत पड़ती है। इस काम के लिए हम कई तरीके इस्तेमाल करते हैं।

मिश्रण: जब कोई वस्तु दो या उससे अधिक पदार्थों से बनी होती है जिसमें किसी भी अवयव का गुण नहीं बदलता है तो ऐसी वस्तु को मिश्रण कहते हैं। हवा एक मिश्रण है। हम जो पानी पीते हैं वह भी एक मिश्रण ही है।

शुद्ध पदार्थ: जब किसी पदार्थ के हर कण के गुण एक ही होते हैं तो उसे हम शुद्ध पदार्थ कहते हैं। उदाहरण: आसुत जल शुद्ध जल होता है क्योंकि इसका एक एक बूंद जल के अणु से ही बना होता है।


पदार्थों को अलग क्यों करते हैं: ऐसा हम किसी मिश्रण से बेकार चीजों को हटाने के लिए करते हैं। कई बार दो उपयोगी चीजों के मिश्रण में से एक उपयोगी चीज निकालने के लिए भी चीजों को अलग किया जाता है। जैसे चावल से कंकड़ या बेकार दानों को हाथ से बीनकर निकाला जाता है।

ठोसों के मिश्रण

हस्तचयन: पदार्थों को अलग करने का यह सबसे सरल तरीका है। जब मिश्रण की मात्रा कम हो और पदार्थों का आकार इतना ही बड़ा हो कि उन्हें हाथों से आसानी से उठाया जा सके तो हाथों से चुनना ही सबसे सही तरीका होता है। जैसे अगर किसी टोकरी में सेब और केले रखे हों और आपको सेब अलग करने हों तो आप आसानी से हाथों से सेब को अलग कर सकते हैं। आपने अपनी माँ को चावल या दाल में से कंकड़ बीनते हुए जरूर देखा होगा।

थ्रेशिंग: कटी हुई फसल की डंडियों से अनाज को निकालने के लिए थ्रेशिंग (दौनी) का इस्तेमाल किया जाता है। थ्रेशिंग तीन तरीके से की जाती है।

हाथ से थ्रेशिंग: जब कटी हुई फसल का गट्ठर छोटा होता है तो उसे किसी कठोर सतह पर हाथ से पीटा जाता है। इससे अनाज अलग हो जाता है।

मवेशी से थ्रेशिंग: जब फसल की मात्रा अधिक होती है तो थ्रेशिंग के लिए मवेशियों की मदद ली जाती है। बांस के एक खूँटे के चारों ओर फसल की गट्ठरों को फैला दिया जाता है। फिर उस खूँटे से एक कतार में कई बैलों या भैंसों को बांधकर फसल पर चलवाया जाता है। मवेशियों के खुरों से रौंदे जाने के कारण अनाज अलग हो जाता है।

थ्रेशिंग मशीन: आजकल थ्रेशिंग मशीन या थ्रेशर का इस्तेमाल बढ़ गया है। इस मशीन को डीजल इंजन या फिर बिजली से चलाया जाता है। इस मशीन की सहायता से बहुत बड़ी मात्रा की थ्रेशिंग बहुत कम समय में हो जाती है। इससे समय और मेहनत की बचत होती है।

चालन: जब कणों का आकार बहुत छोटा होता है या मात्रा बहुत बड़ी होती है तो चालन का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए सही आकार के छेदों वाली चालनी (चलनी) का इस्तेमाल होता है। चालनी में लोहे या नायलॉन की जाली लगी होती है। आटे से चोकर को अलग करने के लिए चालनी का इस्तेमाल होता है। निर्माण स्थल पर रेत से कंकड़ अलग करने के लिए लोहे की बड़ी-बड़ी चालनी का इस्तेमाल होता है।

निष्पावन (विनोविंग): जब पवन की मदद से हल्के कणों को भारी कणों से अलग किया जाता है तो इसे निष्पावन कहते हैं। अनाज से भूसे को अलग करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है। इसके लिये किसान अनाज और भूसे के मिश्रण को किसी सूप में लेकर सिर के ऊपर से धीरे धीरे नीचे गिराता है। पवन के कारण भूसा थोड़ा आगे गिरता है, जबकि अनाज (भारी होने के कारण) पास में गिरता है।

कम्बाइन हार्वेस्टर: आजकल बड़े बड़े खेतों में इस मशीन का इस्तेमाल होने लगा है। यह मशीन कटाई, थ्रेशिंग और निष्पावन सब एक ही साथ कर देती है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में तो यही मशीन इस्तेमाल होती है। भारत में भी यह मशीन आपको पंजाब के किसानों के पास मिल जायेगी।


अवसादन, निस्तारण, निस्यंदन

इन तीनों विधियों को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। जब किसी द्रव में घुलनशीन और अघुलनशील ठोसों के मिश्रण को अलग करना होता है तो इन विधियों का प्रयोग किया जाता है।

अवसादन: किसी मिश्रण में अघुलनशील कणों के तल में बैठने की प्रक्रिया को अवसादन (सेडिमेंटेशन) कहते हैं। जैसे मटमैले पानी में मिट्टी और रेत होती है। मिट्टी और रेत जल में अविलेय होते हैं। इसलिए इनके कण कुछ देर बाद तल में बैठ जाते हैं।

निस्तारण: इस विधि का इस्तेमाल अवसादन के बाद होता है। निस्तारण (डिकैंटेशन) की प्रक्रिया में अवसादित पदार्थ को छेड़े बिना ऊपर से द्रव को किसी दूसरे पात्र में डाला जाता है।

निस्यंदन (फिल्ट्रेशन): निस्तारण के बाद भी द्रव में कुछ महीन कण रह जाते हैं। इन कणों को अलग करने के लिए मिश्रण को एक फिल्टर के ऊपर डाला जाता है। द्रव फिल्टर से आगे निकल जाता है, और ठोस कण फिल्टर में रह जाते हैं।

वाष्पन: जल के वाष्प में बदलने की प्रक्रिया को वाष्पन कहते हैं।

संघनन: जलवाष्प के जल में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं।

किसी भी घुलनशील ठोस को जल से अलग करने के लिए वाष्पन और संघनन की विधि का प्रयोग होता है। जैसे; नमक के घोल से नमक प्राप्त करने के लिए इस विधि का इस्तेमाल होता है।

वाष्पन और संघनन की प्रक्रिया द्वारा ही समुद्र के पानी से नमक बनाया जाता है। समुद्र के खारे पानी को उथले गड्ढों जमा कर के उसे सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब सारा पानी भाप बनकर उड़ जाता है तो गड्ढ़ों में नमक के ढ़ेर बन जाते हैं। इस नमक को कारखानों में आगे की शुद्धिकरण के लिए भेज दिया जाता है।

सांद्र विलयन: जब किसी विलयन में और अधिक विलेय नहीं मिलाया जा सकता है तो ऐसे विलयन को सांद्र विलयन कहते हैं। लेकिन यदि किसी विलयन में और अधिक विलेय मिलाया जा सकता है तो ऐसे विलयन को तनु विलयन कहते हैं।



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