शरीर में गति

गति: किसी भी वस्तु की स्थिति में परिवर्तन को गति कहते हैं। हमारे शरीर में और अन्य जीवों के शरीर में कई तरह की गतियाँ होती रहती हैं।

गमन: जब कोई वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति करती है तो ऐसी गति को गमन कहते हैं। गति और गमन का अर्थ एक ही है लेकिन जीव विज्ञान में दोनों के अर्थ अलग अलग हो जाते हैं। हमारे शरीर में दिल का धड़कना या खून का संचार गति के उदाहरण हैं। लेकिन जब हमारा पूरा शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है तो उसे गमन कहते हैं।

जोड़ (संधि): जहाँ पर दो या अधिक अस्थियों (हड्डियों) का मिलन होता है उसे स्थान को जोड़ कहते हैं। दो हड्डियाँ आपस में लिगामेंट या अस्थिरज्जु से जुड़ी होती हैं। कोई भी अस्थि किसी पेशी से टेंडन या कंडरा की सहायता से जुड़ी होती है।


जो‌ड़ के प्रकार

अचल जोड़: जिस जोड़ में कोई भी गति संभव न हो उसे अचल जोड़ कहते हैं। हमारी खोपड़ी या कपाल के जोड़ अचल जोड़ होते हैं।

गतिशील जोड़: इस प्रकार के जोड़ में गति संभव होती है। कुछ जोड़ पूर्ण रूप से गतिशील होते हैं, जबकि कुछ जोड़ों में आंशिक रूप से गति संभव होती है। गतिशील जोड़ चार प्रकार के होते हैं जो नीचे दिये गये हैं।

  1. कंदुक खल्लिका संधि (बॉल एंड सॉकेट ज्वाइंट): इस प्रकार के जोड़ में एक हड्डी का गोल सिरा दूसरी हड्डी के कटोरे जैसे सिरे में लगा रहता है। कंधे और बाँह के बीच इस तरह की संधि होती है। जांघ और कमर के बीच भी इसी तरह की संधि होती है। इस प्रकार के जोड़ में लगभग हर सतह में गति संभव होती है। आप अपनी बाँह को लगभग हर संभव दिशा में मोड़ सकते हैं।
  2. धुराग्र संधि (पिवट ज्वाइंट): इस तरह के जोड़ में कई सतहों में गति संभव है; जैसे कि ऊपर-नीचे और दायें-बायें। खोपड़ी और मेरुदंड के बीच धुराग्र संधि होती है।
  3. हिंज संधि: यह संधि दरवाजे में लगे कब्जे की तरह काम करती है। इस तरह के जोड़ में एक ही सतह में गति संभव होती है और वह भी 180° के कोण तक। घुटने में और कोहनी में हिंज संधि होती है।
  4. ग्लाइडिंग संधि: इस प्रकार के जोड़ में एक हड्डी के दूसरी हड्डी के ऊपर सरकने के कारण गति होती है। मेरुदंड की छल्ले जैसी हड्डियों के बीच ऐसा ही जोड़ होता है। हमारी कलाई में भी ग्लाइडिंग ज्वाइंट रहता है।

कंकाल तंत्र

किसी भी जंतु में अस्थिओं और उपास्थियों से बना ढ़ाँचा कंकाल कहलाता है। मानव कंकाल 206 हड्डियों से मिलकर बना है। अस्थि कठोर होती है, जबकि उपास्थि मुलायम होती है। जोड़ों के बीच और कुछ मुलायम अंगों में उपास्थि रहती है; जैसे कर्ण-पटल और नाक में। उपास्थि के कारण जोड़ों के बीच घर्षण कम होता है।

कंकाल तंत्र के विभिन्न अंग:

पसली पिंजर (रिब केज): यह एक शंकु के आकार के पिंजरे की तरह दिखता है। इस पिंजर की हड्डियों को पसली कहते हैं। इसमें 12 जोड़ी पसलियाँ होती हैं। ये हड्डियाँ मेरुदंड से जुड़ी रहती हैं। पसली पिंजर का काम है दिल और फेफड़े को सुरक्षा देना।

मेरुदंड: यह कपाल के नीचे से शुरु होता है और कमर के नीचे तक जाता है। मेरुदंड छल्ले जैसी 33 हड्डियों से बना होता है जिन्हें कशेरुक कहते हैं। ये कशेरुकाएँ एक दूसरे से जुड़ी होती हैं।

कंधे की अस्थियाँ: कंधे की अस्थि कई अस्थियों के मिलने से बनी होती है। यह एक त्रिकोण की तरह होती है जिससे एक कॉलर बोन जुड़ी होती है। त्रिकोणाकार हड्डी में एक कटोरी जैसी रचना (ग्लेनॉयड कैविटी) होती है जिसमें बाँह की हड्डी लगी रहती है।

श्रोणि की अस्थियाँ: श्रोणि का निर्माण तीन हड्डियों के मिलने से होता है। श्रोणि एक बक्से जैसी संरचना होती है जो आंतों और अन्य अंदरूनी अंगों को सुरक्षा प्रदान करती है। श्रोणि में एक कटोरी जैसी रचना (एसिटाबुलम) होती है जिससे जांघ की हड्डी लगी रहती है।

कपाल: खोपड़ी मेरुदंड के ऊपर स्थित होती है। कपाल के दो मुख्य भाग होते हैं: क्रेनियम और फेशियल बोन। क्रेनियम का काम है मस्तिष्क को सुरक्षा देना। क्रेनियम की हड्डियाँ चपटी होती हैं और आपस में टांके जैसी संरचनाओं से जुड़ी होती हैं। क्रेनियम की हड्डियों में अचल संधि होती है। फेशियल बोन से कपाल का सामने वाला भाग बनता है। इसमें निचले जबड़े की हड्डी (मैंडिबल) एकमात्र गतिशील हड्डी है। मैंडिबल की गति के कारण हम बोल और चबा सकते हैं।


जंतुओं में गमन

केंचुआ: केंचुए का शरीर छल्ले जैसे कई खंडों का बना होता है। इसके शरीर के अधर सतह (आधार के निकट) असंख्य छोटे-छोटे शूक (बाल जैसी आकृति) होते हैं। ये शूक पेशियों से जुड़े होते हैं। केंचुआ अपने शरीर को लंबाई में सिकोड़कर और फैलाकर गमन करता है। केंचुआ अपने शरीर के अगले भाग को सिकोड़ता है तो इस भाग के शूक आधार को पकड़ कर रखते हैं। इसके कारण शरीर का पिछला भाग आगे की ओर खिंच जाता है। उसके बाद केंचुआ अपने शरीर के पिछले भाग को सिकोड़ता है और शूकों से जमीन को पकड़ता है। ऐसे में शरीर का अगला भाग फैलकर आगे बढ़ जाता है।

घोंघा: घोंघे के शरीर में एक छोटा पेशीय पाद (पैर)‌ होता है जिससे यह गम करता है। घोंघे के पैर की पेशीयाँ बहुत मजबूत होती हैं।

कॉक्रोच: तिलचट्टे के शरीर में तीन जोड़ी पैर होते हैं, जिनकी मदद से यह चलता और दौड़ता है। इसके शरीर में दो जोड़ी पंख होते हैं, जिनकी मदद से यह उड़ सकता है। पैरों की गति के लिए बड़ी और शक्तिशाली पेशियाँ होती हैं।

पक्षी: पक्षी अपने दो पैरों पर चलता है। अधिकतर पक्षी अपने पंखों की सहायता से आसमान में उड़ सकते हैं। कुछ पक्षी अच्छे तैराक भी होते हैं। पक्षियों का शरीर धारारेखीय (स्ट्रीमलाइंड) होता है, जिससे हवा में आगे बढ़ने में सहूलियत होती है।

सांप: सर्प के शरीर में कशेरुक एँ अधिक संख्या में होती हैं। इन कशेरुकाओं से पतली पेशियाँ जुड़ी रहती हैं। जब एक सांप गमन करता है तो यह अगल बगल लूप या अंग्रेजी के S अक्षर जैसी आकृति बनाता है। इसी लूप से आगे बढ़ने के लिये बल मिलता है और सांप आगे बढ़ता है।

मछली: मछलियों मे तैरने के लिए खास रूप से पख और पूँछ होती है। मछली का शरीर धारारेखीय होता है। मछली अपने शरीर को एक ओर मोड़ती है तो पूँछ दूसरी दिशा में मुड़ जाती है। उसके बाद मछली अपने शरीर को दूसरी ओर मोड़ती है तो पूँछ विपरीत दिशा में मुड़ जाती है। इस के कारण आगे की ओर धक्का मिलता है जिससे मछली आगे बढ़ जाती है। पूँछ से दिशा बदलने में मदद मिलती है।



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