खाद्य सुरक्षा

खाद्य सुरक्षा का मतलब है लोगों के पास हमेशा भोजन उपलब्ध होना। खाद्य सुरक्षा के निम्नलिखित आयाम हैं:

  1. खाद्य की उपलब्धता: इसका आकलन इस बात से लगाया जाता है कि देश में कुल उत्पादन कितना हुआ, कितना खाद्य निर्यात हुआ और सरकारी भंडारों में पिछले वर्षों का स्टॉक कितना है।
  2. खाद्य की पहुँच: इसका मतलब है कि खाद्य की पहुँच हर व्यक्ति तक है।
  3. सामर्थ्य: इसका मतलब है कि हर व्यक्ति के पास पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित और पोषक भोजन खरीदने के लिए पर्याप्त रुपए हैं ताकि उस व्यक्ति की पोषण आवश्यकता पूरी हो सके। यदि कोई आदमी केवल चावल या गेहूँ खरीद पाता है लेकिन दाल, सब्जी या मांस/मछली नहीं खरीद पाता है तो उसके पास सामर्थ्य का अभाव है।

खाद्य सुरक्षा की जरूरत

खाद्य सुरक्षा की जरूरत कई उद्देश्यों के लिए होती है। सबसे मुख्य उद्देश्य होता है कि किसी भी व्यक्ति को खाली पेट नहीं सोना पड़े। दूसरा उद्देश्य है कि प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इतना अधिशेष खाद्य रहना चाहिए ताकि आपदा से प्रभावित लोगों को समुचित मात्रा में खाद्य की आपूर्ति हो सके।


अकाल

जब भुखमरी के कारण या मजबूरी में दूषित जल पीने या सड़े हुए भोजन को खाने के कारण बड़े पैमाने पर लोगों की मौत होने लगे तो ऐसी स्थिति को अकाल कहते हैं। 1943 का बंगाल का अकाल इतिहास का सबसे भीषण अकाल था। इस अकाल में बंगाल में लगभग 30 लाख लोग मारे गये थे।

कई लोगों का मानना था कि खाद्य की कमी के कारण बंगाल में अकाल पड़ा था। लेकिन डाटा देखने से पता चलता है कि 1938 से 1945 के दौरान धान का उत्पादन लगभग एक समान था। इसलिए सही तरीके से देखने पर पता चलता है कि अकाल खाद्य की कमी के कारण नहीं बल्कि खाद्य की पहुँच की कमी के कारण पड़ा था।

खाद्य असुरक्षा

खाद्य असुरक्षा से सबसे अधिक पीड़ित होने वाले लोग हैं भूमिहीन गरीब, परंपरागत दस्तकार, परंपरागत सेवा प्रदान करने वाले, छोटे-मोटे काम करने वाले और बेसहारा लोग। शहरी इलाकों में जो लोग कम मेहनताने वाले काम करते हैं और जो मौसमी काम करते हैं, वो खाद्य असुरक्षा की समस्या से ग्रसित होते हैं।

यदि भारत के विभिन्न सामाजिक समूहों को देखें तो हम पाते हैं कि अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़ी जाति के कुछ वर्ग या तो भूमिहीन हैं या उनके पास बहुत कम जमीन है। ऐसे लोगों पर खाद्य असुरक्षा का खतरा सबसे अधिक रहता है। जो लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं उनपर भी खाद्य असुरक्षा का खतरा रहता है। महिलाएँ, खासकर से गर्भवती महिलाएँ भी खाद्य असुरक्षा से ग्रसित हो सकती हैं।

बिमारु राज्यों (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) और ओडिसा की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खाद्य असुरक्षा से पीड़ित हो सकता है।

भुखमरी न केवल गरीबी की निशानी होती है बल्कि यह गरीबी को लाती भी है। भुखमरी मौसमी या फिर दीर्घकालिक हो सकती है। जो लोग बहुत कम कमाते हैं और अधिकतर समय भुखमरी के शिकार रहते हैं उनमें दीर्धकालिक भुखमरी देखने को मिलती है। मौसमी भुखमरी अक्सर कृषि के चक्र से संबंधित होती है। कई भूमिहीन किसान और सीमांत किसान भी मौसमी भुखमरी के शिकार होते हैं। शहरी इलाकों में जिन लोगों को मौसमी बेरोजगारी की समस्या होती है उन्हें मौसमी भुखमरी से जूझना पड़ता है।


भारत में भुखमरी से पीड़ित परिवारों का प्रतिशत

वर्षभुखमरी का प्रकार
मौसमीदीर्घकालिककुल
ग्रामीण 198316.22.318.5
1993-944.20.95.1
1999-20002.60.73.3
शहरी 19835.60.86.4
1993-941.10.51.6
1999-20000.60.30.9

इस टेबल से पता चलता है कि भारत में खाद्य असुरक्षा से ग्रसित लोगों का प्रतिशत काफी नीचे चला गया है, जो कि एक अच्छी बात है।



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