9 समाज शास्त्र

प्राकृतिक वनस्पति तथा वन्य प्राणी

प्राकृतिक वनस्पति: जो वनस्पति मानव सहायता के बिना अपने आप पनपती है उसे प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं। यदि इस वनस्पति पर लंबे समय तक मानव का प्रभाव न पड़े तो इसे अक्षत वनस्पति कहते हैं।

वनस्पति जात: किसी क्षेत्र विशेष या काल में पाये जाने वाली वनस्पति की प्रजातियों को सामूहिक रूप से वनस्पति जात कहते हैं।

प्राणी जात: किसी क्षेत्र विशेष या काल में पाये जाने वाली जंतुओं की प्रजातियों को सामूहिक रूप से प्राणी जात कहते हैं।

किसी भी स्थान के वनस्पति जात और प्राणी जात को प्रभावित करने वाले कारक हैं: धरातल और जलवायु।

धरातल:

  1. भूभाग: प्राकृतिक वनस्पति पर भूभाग का सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि भूभाग समतल और उपजाऊ है तो इसे मुख्य रूप से कृषि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यदि भूभाग समतल नहीं है तो फिर वहाँ पर घास के मैदान या जंगल पनपने की प्रबल संभावना होती है।
  2. मृदा: अलग-अलग प्रकार की मृदा अलग-अलग प्रकार की वनस्पति के लिए उपयुक्त होती है। जैसे, बलुई मिट्टी में बबूल और कैकटस आराम से पनपते हैं, जबकि मैंग्रोव वनस्पति के लिए दलदली मृदा की जरूरत होती है।

जलवायु

  1. तापमान और आर्द्रता: किसी भी स्थान पर पाई जाने वाली वनस्पति के प्रकार और सघनता को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं तापमान और आर्द्रता। अधिक तापमान और अधिक आर्द्रता के मेल वाली जगह पर सदाबहार वन पाये जाते हैं। दूसरी ओर, अधिक तापमान और कम आर्द्रता वाली जगह पर कांटेदार झाड़ियाँ पाई जाती हैं।
  2. सूर्य का प्रकाश: किसी भी स्थान पर मिलने वाले सूर्य के प्रकाश की मात्रा और अवधि उस स्थान के अक्षांश, देशांतर, ऋतु और दिन की अवधि पर निर्भर करती है। गर्मी के मौसम में सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक मिलता रहता है। इसलिए गर्मी के मौसम में पेड़ तेजी से बढ़ते हैं।
  3. वर्षण: जिस क्षेत्र में भारी वर्षा होती है वहाँ घनी वनस्पति उगती है। लेकिन अल्पवृष्टि वाले क्षेत्रों में काँटेदार झाड़ियाँ ही उग पाती हैं।

पारितंत्र: किसी भी क्षेत्र के पादप और जंतु एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। किसी भी स्थान पर पाये जाने वाले जंतुओं, वनस्पतियों और वहाँ के पर्यावरण की परस्पर निर्भरता वाले इस तंत्र को पारितंत्र कहते हैं। एक विशाल पारितंत्र को जैवक्षेत्र या बायोम कहते हैं।

वनस्पति के प्रकार

भारत में पाँच प्रकार की वनस्पति पाई जाती है: उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (वर्षा वन), उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन, उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन तथा झाड़ियाँ, पर्वतीय वन और मैंग्रोव वन।

Types of Vegetation in India

उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन

अत्यधिक वर्षण वाले क्षेत्रों में उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन या वर्षा वन पाया जाता है। भारत में ऐसे क्षेत्र पश्चिमी घाट, असम के ऊपरी हिस्सों, तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र और लक्षद्वीप तथा अंदमान निकोबार द्वीप समूह में हैं।

जिस क्षेत्र में 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षण हो और जहाँ शुष्क मौसम बहुत छोटा हो, वैसा क्षेत्र उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन के लिए सबसे अनुकूल स्थान होता है। ऐसे वन में लगभग हर किस्म के वृक्ष, झाड़ियाँ और शाक पाए जाते हैं। इस वन के अलग-अलग पेड़ साल के अलग अलग महीनों में अपने पत्ते गिराते हैं। इसलिए यह वन हमेशा हरा भरा रहता है और सदाबहार कहलाता है। ऐसे वन में कई स्तर होते हैं।

सदाबहार वन में पाये जाने वाले महत्वपूर्ण वनस्पति के नाम हैं: एबोनी, महोगनी, रोजवुड, रबड़, सिनकोना, आदि। इस तरह के वन में पाये जाने वाले मुख्य जंतु हैं: हाथी, बंदर, लेमर और हिरण। साथ में यहाँ कई किस्म के पक्षी, चमगादड़, स्लॉथ, बिच्छू और घोंघा पाये जाते हैं।

उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन

भारत के अधिकाँश हिस्से में उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन या पतझड़ वन पाया जाता है। जिन क्षेत्रों में 70 सेमी से 200 सेमी तक वर्षण होती है वहाँ इस प्रकार का वन पाया जाता है। पर्णपाती या पतझड़ वन के पेड़ों से गर्मी के मौसम में पत्ते झड़ते हैं। इन्हें मानसून वन भी कहा जाता है।

जल की उपलब्धता के आधार पर इन वनों की दो किस्में होती हैं:

  1. आर्द्र पर्णपाती वन: 100 से 200 सेमी वर्षण वाले क्षेत्रों में आर्द्र पर्णपाती वन पाया जाता है। इस प्रकार के वन मुख्य रूप से भारत के पूर्वी हिस्से (पूर्वोत्तर राज्यों), हिमालय के गिरिपद (फूटहिल), झारखंड, पश्चिमी ओडीशा और छत्तीसगढ़ में पाये जाते हैं। पश्चिमी घाट के पूर्वी ढ़ाल पर भी आर्द्र पर्णपाती वन पाया जाता है।
  2. शुष्क पर्णपाती वन: 70 से 100 सेमी वर्षण वाले क्षेत्रों में शुष्क पर्णपाती वन पाया जाता है। इस प्रकार के वन पठार के वर्षा वाले क्षेत्रों और बिहार तथा उत्तर प्रदेश के मैदानों में पाये जाते हैं।

पर्णपाती वन के महत्वपूर्ण पेड़ हैं: सागौन, बाँस, साल, शीशम, चंदन, खैर, कुसुम, अर्जुन, शहतूत, आदि। पर्णपाती वन के मुख्य जंतु हैं: शेर, बाघ, सूअर, हिरण और हाथी। इनके अलावा यहाँ नाना किस्म के पक्षी, छिपकलियाँ, साँप और कछुए भी पाये जाते हैं।