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बुद्ध की कहानी

गौतम बुद्ध का असली नाम सिद्धार्थ था। आज से 2500 वर्ष पहले आधुनिक नेपाल के कपिलवस्तु के लुंबिनी में सिद्धार्थ का जन्म हुआ था। वह एक क्षत्रिय थे और शाक्य नामक गण के सदस्य थे। सिद्धार्थ एक राजकुमार थे। बचपन में उन्हें हर सुख सुविधा मिली हुई थी। जब सिद्धार्थ बड़े हुए तो जीवन के सही अर्थ के बारे में उनके मन में कई तरह के सवाल उठने लगे। जीवन का अर्थ जानने के लिए सिद्धार्थ ने अपना घर छोड़ दिया और इधर उधर भटकने लगे। उन्होंने कई ज्ञानी लोगों से बात की लेकिन उन्हें अपने सवालों के उत्तर नहीं मिले।

अंत में सिद्धार्थ बोध गया में एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठ गये। कई दिनों तक ध्यान लगाने के बाद सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद वे ‘बुद्ध’ यानि सही मायनों में ज्ञानी बन गये। उसके बाद बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन वाराणसी के निकट सारनाथ में दिया। उसके बाद वे लोगों में ज्ञान का प्रसार करने लगे। बुद्ध की मृत्यु कुशीनगर (कुशीनारा) में हुई।


बुद्ध की शिक्षा:

बुद्ध ने अपने प्रवचन में प्राकृत भाषा का इस्तेमाल किया था। उस समय आम आदमी प्राकृत भाषा का ही इस्तेमाल करते थे। आम आदमी की भाषा के इस्तेमाल के कारण ही बुद्ध की शिक्षा अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच पाई थी। बुद्ध ने लोगों से कहा कि उनकी बाद पर ऐसे ही यकीन न करें बल्कि अपने विवेक का इस्तेमाल करने के बाद ही यकीन करें।


उपनिषद

उपनिषद में कई तार्किक और आध्यात्मिक विचारों का संकलन है। उपनिषदों की रचना बुद्ध के जमाने में ही हुई थी। उपनिषदों को गुरु और शिष्य के बीच के संवाद की शैली में लिखा गया है।

उपनिषदों की रचना में मुख्यत: ब्राह्मण और क्षत्रिय पुरुषों का योगदान है। लेकिन कुछ महिलाओं ने भी इसमें अपना योगदान दिया है। ऐसी ही एक महिला का नाम है गार्गी। वह राजदरबार में होने वाली बहसों में हिस्सा लेती थीं। गरीब लोग शायद ही ऐसे वाद विवाद में हिस्सा ले पाते थे। लेकिन सत्यकाम जाबाल एक अपवाद थे। सत्यकाम की माता एक दासी थी जिनका नाम जाबाली था। गौतम नाम के एक ब्राह्मण ने सत्यकाम को अपना शिष्य बनाया और फिर उन्हें शिक्षा दी।

मनुष्य का दिमाग हमेशा से जीवन के अनसुलझे रहस्यों को समझने की कोशिश करता रहा है। इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप उपनिषदों की रचना हो पाई। लोग जीवन और उसके बाद के रहस्यों के बारे में जानना चाहते थे। कई लोगों ने आडंबरों और बलि प्रथा पर सवाल उठाने शुरु कर दिये। कई विचारकों का मानना था कि कुछ तो चिर स्थाई है तो जीवन के बाद भी कायम रहता है। इस चिर स्थाई चीज को उन्होंने आत्मा का नाम दिया। सार्वभौम आत्मा को ब्रह्म का नाम दिया गया। इन विचारकों का मानना था कि अंतत: आत्मा और ब्रह्म एकाकार हो जाते हैं।



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