राजा, राज्य और गणराज्य

आप क्या सीखेंगे:

आज से लगभग 3000 वर्ष पहले यानि 600 ई पू राजाओं की स्थिति में ब‌ड़े बदलाव हुए। वैदिक युग के राजाओं की तुलना में इस युग के राजा अधिक शक्तिशाली हो गये।


अश्वमेध यज्ञ

अब राजा चुनने की विधि भी बदल गई थी। जो व्यक्ति राजा बनना चाहता था उसे अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए बड़े अनुष्ठान करने पड़ते थे। ऐसा राजा अक्सर दूसरे राजाओं पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ करता था।

अश्वमेध यज्ञ की कुछ रोचक बातें नीचे दी गई हैं:


वर्ण व्यवस्था

समाज को चार वर्णों में बाँटा गया था, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र‌।

  1. ब्राह्मण: ब्राह्मण को वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊँचा स्थान दिया गया था। ब्राह्मणों का काम था वेदों को पढ़ना और पढ़ाना। उन्हें तरह तरह के अनुष्ठान संपन्न कराने होते थे। इन अनुष्ठानों को करवाने के बदले में उन्हें उपहार दिये जाते थे।
  2. क्षत्रिय: इस वर्ण का स्थान दूसरे नंबर पर आता था। इस वर्ण में शासक वर्ग के लोग आते थे। क्षत्रिय का काम था युद्ध लड़ना और लोगों की सुरक्षा करना। क्षत्रिय भी अनुष्ठान कर सकते थे।
  3. वैश्य: इस वर्ण का स्थान तीसरे नंबर पर आता था। किसान, चरवाहे और व्यापारी इस वर्ण के सदस्य होते थे। वैश्यों को भी अनुष्ठान करने का अधिकार था।
  4. शूद्र: यह वर्ण सबसे निचले पायदान पर रखा गया था। शूद्रों का काम था अन्य तीन वर्णों की सेवा करना। महिलाओं को भी शूद्र माना जाता था। शूद्रों को यज्ञ करने की अनुमति नहीं थी। वे ऐसे अनुष्ठानों में शामिल भी नहीं हो सकते थे।

किसी भी व्यक्ति का वर्ण उसके जन्म से तय होता था। यानि, एक ब्राह्मण का बेटा हमेशा एक ब्राह्मण ही रहता था। इसी तरह किसी शूद्र का बेटा हमेशा शूद्र ही रहता था। लेकिन कुछ लोग इस व्यवस्था से सहमत नहीं थे, यहाँ तक कि कुछ राजा भी इसके विरोध में थे। उदाहरण के लिए पूर्वोत्तर भारत में समाज में इतना अधिक भेदभाव नहीं था और पुजारियों को उतना महत्व प्राप्त नहीं था।



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