चुनावी राजनीति

चुनाव लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग होता है क्योंकि चुनावों के माध्यम से ही लोग अपने जनप्रतिनिधियों को चुनते है ताकि सरकार का गठन हो और बाकी कामकाज हों। भारत में चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं होते हैं। इस लेसन में आप चुनाव की जरूरत के बारे में पढ़ेंगे। उसके बाद आप भारत के चुनावी प्रक्रिया के बारे में पढ़ेंगे जिसमें आपको निर्वाचन क्षेत्र, चुनाव आयोग, मतदाता पहचान पत्र और मतगणना के बारे में पता चलेगा। आखिर में आप इस बारे में पढ़ेंगे कि भारत के चुनाव किस तरह से लोकतांत्रिक हैं और मोटे तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं।

चुनाव क्यों होते हैं?

चुनावों के द्वारा:

लोकतांत्रिक चुनाव के लक्षण:

राजनैतिक प्रतिस्पर्द्धा की सार्थकता

लोगों की अक्सर यह शिकायत होती है कि राजनैतिक प्रतिस्पर्द्धा समाज के लिए अच्छी नहीं होती है क्योंकि इससे गलत आदतों और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। राजनेता चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडे अपनाने को तैयार रहते हैं। लेकिन हमें इसके दूसरे पहलू को भी देखना चाहिए। ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब कोई शक्तिशाली नेता चुनाव हार जाता है। कई राजनेता धन और लाठी के बल पर भी चुनाव नहीं जीत पाते हैं। चूँकि नेताओं को चुनाव हारने का डर रहता है इसले वे जनता की भलाई के काम करते हैं। नेता इसलिए भी काम करते हैं कि अच्छा काम करने से चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाती है। कुछेक अपवादों को छोड़कर भारत में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं और इसे निष्पक्ष बनाने में राजनैतिक प्रतिस्पर्द्धा की भी अपनी भूमिका होती है।

भारत की चुनाव प्रणाली

निर्वाचन क्षेत्र: पूरे देश को जनसंख्या के हिसाब से विभिन्न चुनावी क्षेत्रों में बाँटा जाता है। ऐसे क्षेत्र को निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं। भारत में लोक सभा के 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं। अलग अलग राज्यों में विधान सभा के निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या अलग-अलग है। एक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता अपने ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि का चुनाव करते हैं।

आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र: संविधान निर्माताओं का मानना था कि समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों का राजनैतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए उन्हें कुछ सुविधाएँ देनी होंगी। इसलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए। 26 जनवरी 2019 तक की स्थिति के अनुसार भारतीय संसद में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों से आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन वहाँ के मतदाता समाज के हर वर्ग से होते हैं। अब स्थानीय निकायों के चुनावों के लिए सरकार ने अति पिछड़ा वर्ग के लिए भी सीटें आरक्षित कर दी है। आरक्षित सीटों का प्रतिशत आबादी में उन समुदायों के प्रतिशत के अनुपात में रहता है।

मतदाता सूची: चुनाव के कुछ महीने पहले हर निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं की एक लिस्ट बनाई जाती है जिसे मतदाता सूची या वोटर्स लिस्ट कहते हैं। वोटर्स लिस्ट में समय समय पर संशोधन होता रहता है ताकि नये मतदाताओं को शामिल किया जा सके और मृत लोगों के नाम हटा दिए जाएं।

फोटो पहचान पत्र: जब मतदाता सूची तैयार हो जाती है तो हर मतदाता को वोटर पहचान पत्र (फोटो पहचान पत्र) बनवाना होता है। बोगस वोटिंग को रोकने के उद्देश्य से फोटो पहचान पत्र की शुरुआत हुई थी। यदि पहले से फोट पहचान पत्र है तो उससे काम चल सकता है। पॉलिंग बूथ पर मतदाता को वोटर आई डी दिखाना होता है। यदि वोटर आई डी नहीं है तो कोई और पहचान पत्र दिखा सकते हैं, जैसे ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, पैन कार्ड, आदि।

उम्मीदवार का नामांकन: जब चुनाव की तारीख की घोषणा हो जाती है तो उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करना पड़ता है। जब किसी उम्मीदवार को किसी राजनैतिक पार्टी द्वारा चुना जाता है तो इसे आम बोलचाल की भाषा में पार्टी का टिकट मिलना कहते हैं। नामांकन फाइल करते समय उम्मीदवार को कुछ जानकारी और एक जमानत राशि जमा करनी होती है। उम्मीदवार द्वारा दी जानी वाली कुछ जानकारियाँ निम्नलिखित हैं:


चुनाव प्रचार: पार्टी और उम्मीदवार अपने कार्यक्रमों और नीतियों के बारे में जनता को शिक्षित करने के लिए चुनाव प्रचार करते हैं। राजनैतिक पार्टियाँ इसके लिए जनसभाएँ करती हैं जो रैली, नुक्कड़ सभा, मुहल्ला सभा, आदि के रूप में होती हैं। साथ में होर्डिंग, विज्ञापन, बैनर, पोस्टर और पैम्फलेट का सहारा भी लिया जाता है। राजनैतिक पार्टियाँ अक्सर वोटर का ध्यान बड़े मुद्दों पर केंद्रित करने की कोशिश करती हैं, जैसे कि गरीबी उन्मूलन, भ्रष्टाचार, रोजगार, बिजली, पानी, भोजन, आदि।

चुनाव प्रचार के दौरान इन कार्यों पर प्रतिबंध होता है:

आचार संहिता: जैसे ही चुनाव की तारीख घोषित हो जाती है वैसे ही चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लागू हो जाती है। आचार संहिता के अनुसार निम्नलिखित गतिविधियों पर प्रतिबंध होता है:

मतदान और मतगणना: भारत दुनिया के उन गिने चुने देशों में से है जहाँ मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल होता है। अपना वोट डालने के लिए मतदाता को अपनी पसंद के चुनाव चिह्न के साथ वाला बटन दबाना होता है। बैलट पेपर की तुलना में ईवीएम से कई फायदे होते हैं। ईवीएम वजन में हल्के होते हैं और किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए बहुत कम मशीनों की जरूरत होती है। मतगणना में बहुत कम समय लगता है और मतगणना अधिक सटीक होती है। आजकल, ईवीएम से पेपर ट्रेल भी छापा जा सकता है। ईवीएम के इस्तेमाल के कारण अब मतगणना के कुछ दिनों के भीतर ही रिजल्ट आ जाते हैं।

बैलट पेपर के दिनों में चुनाव केंद्र से बैलट बॉक्स को लाने जाने में बड़ी परेशानी होती है। मतगणना में तीन चार दिन लग जाते थे। धांधली के आसार भी बहुत अधिक होते थे।

चुनाव आयोग

चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्थान है जो सरकार से पूरी तरह स्वतंत्र होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा होती है। जैसे ही चुनाव की तारिख घोषित हो जाती है मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना असंभव होता है। चुनाव की तारीख घोषित होते ही पूरा प्रशासन चुनाव आयुक्त के अधीन हो जाता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थान बन जाता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि भारत में सही मायने में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होते हैं।

लोगों की भागीदारी

आम धारणा के विपरीत, भारत के चुनावों में लोगों की भागीदारी बढ़ती जा रही है। 2013 में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में वोटर टर्नआउट कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में 80% तक गया था।

भारत के चुनावों में गरीब तबके के लोग अधिक जोश से मत डालने आते हैं। मध्यम और उच्च वर्ग के लोग चुनावी प्रक्रिया के प्रति उदासीन ही रहते हैं। लेकिन हाल के विधानसभा चुनावों में मध्यम और उच्च वर्ग से भी लोग अच्छी संख्या में मतदान करने निकले थे।

जब लोग चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते हैं तो यह किसी भी लोकतंत्र के जीवंतता की निशानी होती है।

चुनावी नतीजों को स्वीकारना: लोग हमेशा यह शिकायत करते हैं कि भारत के चुनावों में बहुत धांधली होती है। लेकिन यह केवल एक धारणा है जो वास्तविकता से अलग है। नीचे कुछ तथ्य दिए गए हैं जो भारत के चुनावों की लोकतांत्रिक प्रवृत्ति को दिखाते हैं।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की चुनौतियाँ



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