वन्य समाज और उपनिवेशवाद

जब हम इतिहास पढ़ते हैं तो अक्सर राजाओं के बारे में, और खासकर विजेताओं के बारे में पढ़ते हैं। यदि समाज के अन्य समूहों की कभी बात होती है तो गाँवों और शहरों के समाज और अर्थव्यवस्था की बात होती है। ऐसा बहुत कम ही होता है जब इतिहास में उन लोगों के बारे में बताया जाता है जो समाज के हाशिये से भी दूर रहते हैं। आदिवासी, यानि वनों में और उसके आस पास रहने वाले लोग ऐसी ही श्रेणी में आते हैं। इस अध्याय में आप वन और वन्य समाज पर उपनिवेशवाद के प्रभाव के बारे में पढ़ेंगे। इस चेप्टर में मुख्य रूप से भारत के आदिवासियों की स्थिति बताई गई है। साथ में जावा के जंगलों में क्या हुआ उसके बारे में भी बताया गया है।

जंगलों की विविधता तेजी से कम हो रही है। औद्योगीकरण के दौर में (1700 से 1995) उद्योग, खेती, चारागाह और ईंधन के लिए 13.9 मिलियन वर्ग किलोमीटर जंगलों का सफाया हो गया। इसका मतलब है कि दुनिया के कुल क्षेत्रफल के 9.3% हिस्से से जंगल साफ हो गये। जंगलों को साफ करने की प्रक्रिया को वन विनाश कहते हैं। जंगलों को कई सदियों से काटा जा रहा है लेकिन उपनिवेशों के युग में यह बहुत तेजी से हुआ था।

1600 इसवी में भारत के भूभाग का छ्ठा भाग खेती के लिए इस्तेमाल होता था। अब यह बढ़कर कुल भूभाग का लगभग आधा यानि 50% हो चुका है।


उपनिवेशी शासन का वनों पर असर

पूरी दुनिया के उपनिवेशकों का मानना था कि बियाबान हिस्से पर कब्जा करना चाहिए ताकि उसका इस्तेमाल व्यावसायिक तौर पर किया जा सके। इस दौरान जूट, गन्ना, गेहूँ और कपास जैसी व्यावसायिक फसलों का उत्पादन बढ़ने लगा। यूरोप में बढ़ती हुई शहरी आबादी का पेट भरने के लिए इसकी जरूरत भी महसूस होने लगी थी। साथ में तेजी से बढ़ते उद्योग के लिए कच्चे माल की भी जरूरत थी। भारत में 1880 से 1920 के बीच खेती की जमीन में 6.7 मिलियन हेक्टेयर का इजाफा हुआ।

बीसवीं सदी की शुरुआत में इंगलैंड में ओक (बलूत) के पेड़ तेजी से कम होने लगे। इससे ब्रिटेन के जहाजरानी उद्योग में लकड़ी की किल्लत होने लगी। उस जमाने में ब्रिटेन की सैन्य शक्ति के लिए जहाज अत्यंत महत्वपूर्ण थे। अंग्रेजों को भारत के जंगलों में लकड़ी के अच्छे स्रोत नजर आ रहे थे। इस तरह भारत में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाने लगे।

1850 के दशक में रेलवे के विस्तार से लकड़ी की माँग बढ़ गई। रेल की पटरी को एक साथ बनाये रखने के लिए स्लीपर की जरूरत होती है और उस समय स्लीपर लकड़ी से बनते थे। एक मील तक रेल की पटरी बिछाने के लिए 1760 से 2000 स्लीपर की जरूरत पड़ती है। 1890 तक 25,500 किलोमीटर रेल लाइन बिछ चुकी थी। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इसके लिए स्लीपर बनाने के लिए कितने पेड़ कटे होंगे।

बागान

अंग्रेजों ने चाय, कॉफी और रबड़ उगाने के लिए बागान लगाने शुरु किए। यूरोप के बागान मालिकों को बागान विकसित करने के लिए सस्ते दर पर जमीन दी गई। फिर उस जमीन से वनों को साफ किया गया ताकि बागान बनाये जा सकें।

भारत में वन संसाधन को ठीक से नियंत्रित करने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने डायट्रिच ब्रैंडिस नाम के एक जर्मन को यहाँ का पहला इंस्पेक्टर जेनरल ऑफ फॉरेस्ट नियुक्त किया। ब्रैंडिस ने एक नया सिस्टम लागू किया और लोगों को वन संसाधन के संरक्षण के लिए प्रशिक्षण देना शुरु किया। 1864 में इंडियन फॉरेस्ट सर्विस शुरु हुई और 1865 इंडियन फॉरेस्ट एक्ट लागू हुआ।

मवेशी चराना, पेड़ काटना और वन उत्पाद के प्रयोग को गैरकानूनी और दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया। वैज्ञानिक वानिकी के नाम पर प्राकृतिक वनस्पति के स्थान पर एक ही तरह के पेड़ (साल या युकेलिप्टस) लगाये गये। आधुनिक पर्यावरणविद इसे मोनोकल्चर का नाम देते हैं और इसे पर्यावरण के लिए खराब मानते हैं।

इंडियन फॉरेस्ट एक्ट में दो बार संशोधन हुआ, एक बार 1878 में और फिर 1927 में। 1878 के संशोधन के बाद वनों को तीन वर्गों में बाँटा गया, आरक्षित, सुरक्षित और ग्रामीण। सबसे उन्नत किस्म के वनों को आरक्षित वन की श्रेणी में रखा गया। आरक्षित वन से अब कोई भी कुछ नहीं ले सकता था। अब वन संपदा के लिए जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों को सुरक्षित और ग्रामीण वनों पर निर्भर रहना पड़ता था। वन के आसपास रहने वाले लोग सदियों से भोजन, औषधि, जलावन और कई अन्य सामानों के लिए वनों पर आश्रित थे। नये नियमों से उनका जीवन बहुत कठिन हो गया था। अब उन्हें जंगलों से लकड़ियाँ चुराने को बाध्य होना पड़ता था। इसमें पकड़े जाने फॉरेस्ट गार्ड से अपमानित होने का खतरा रहता था।


वन कानून और कृषि

भारत के आदिवासियों में घुमंतू खेती की पुरानी परंपरा रही है। इस प्रकार की खेती में जंगल के एक छोटे हिस्से से पेड़ों को काट कर और फिर उनमें आग लगाकर जमीन साफ की जाती है। उसके बाद मानसून की पहली बारिश के साथ राख मिली मिट्टी में बीज बो दिए जाते हैं। एक दो साल खेती करने के बाद उस जमीन को अगले 10 से 12 वर्षों के लिए परती छोड़ दिया जाता है ताकि वहाँ दोबारा पेड़ उग सकें।

अंग्रेज ऑफिसर इस तरह की खेती को वनों के लिए नुकसानदेह मानते थे। उन्हें लगता था कि इससे आस पास के पेड़ों में आग लगने का खतरा रहता था। घुमंतू खेती करने वाले किसानों से मालगुजारी वसूलना भी मुश्किल होता था। इसलिए सरकार ने घुमंतू खेती पर प्रतिबंध लगा दिया।

नये कानूनों का प्रभाव कई परिवारों पर पड़ा। कई लोगों को अपना पेशा बदलना पड़ा। कई लोग कम मेहनताने पर काम करने के लिए बाध्य हो गये। कई लोग शहरों की ओर पलायन कर गये। लेकिन कुछ लोगों ने इसका विरोध करना शुरु किया।

शिकारियों पर प्रभाव

कई आदिवासी अपना पेट भरने के लिए छोटे जानवरों, जैसे हिरण और तीतर का शिकार करते थे। नये कानून ने शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया और यदि किसी को शिकार करते हुए पकड़ा जाता तो उसे सजा मिलती थी। लेकिन भारत के राजा और अंग्रेज अधिकारी बड़े जानवरों का शिकार करते थे। उन्हें लगता था कि हिंसक जानवरों को मारने से लोगों का जीवन अधिक सुरक्षित हो जायेगा। उस समय बाघों को मारना बहादुरी और शान की निशानी माना जाता था। राजा और अंग्रेज ऑफिसर अक्सर अपने बैठकखानों में जानवरों की खाल और सिर की नुमाइश करते थे ताकि लोगों को अपनी बहादुरी के किस्से सुना सकें।



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