नात्सीवाद और हिटलर

बीसवीं सदी के पूर्वार्ध का दौर पूरी दुनिया और खासतौर से यूरोप के लिए बड़े उथल पुथल का दौर था। इसी दौर में विश्वयुद्ध हुए थे जिनके परिणामस्वरूप दुनिया की तस्वीर ही बदल गई। प्रथम विश्वयुद्ध के कई दुष्परिणाम हुए, जिनमें से एक परिणाम था जर्मनी में नात्सीवाद और हिटलर का उदय। नात्सीवादियों के अजीबोगरीब दृष्टिकोण के भयानक परिणाम निकले। इस लेसन में आप नात्सीवाद के उदय और उसके परिणामों के बारे में पढ़ेंगे।

वाइमर गणराज्य

सबसे पहले हमें यह समझने की जरूरत है कि वैसे कौन से हालात थे जिसके कारण हिटलर को अपने पैर जमाने का मौका मिला और नात्सीवादी ताकतें प्रभावी हो गईं। बीसवीं सदी की शुरुआत में जर्मनी एक शक्तिशाली साम्राज्य था। जर्मनी ने ऑस्ट्रियाई साम्राज्य के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों (इंगलैंड, फ्रांस और रूस) के खिलाफ प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) लड़ा था। 1917 में अमेरिका का साथ मिलने से मित्र राष्ट्रों की ताकत बढ़ गई और उन्होंने नवंबर 1918 में जर्मनी को हरा दिया।

जर्मन साम्राज्य की हार के साथ जर्मनी में एक लोकतांत्रिक गणराज्य का रास्ता साफ हुआ। राजनैतिक पार्टियाँ वाइमर में नेशनल एसेंबली की बैठक में शामिल हुईं और संघीय ढ़ाँचे वाले एक लोकतांत्रिक संविधान का गठन हुआ। जर्मनी की संसद (राइखस्टाग) के लिए प्रतिनिधि चुनने के लिए सार्वभौमिक मताधिकार दिया गया, यानि हर वयस्क स्त्री और पुरुष को वोट देने का अधिकार मिला।

वर्साय संधि: लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी पर कुछ ऐसी शर्तें थोप दी गईं जिससे जर्मनी के लोगों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँची। उस संधि समझौते के अनुसार, जर्मनी के उपनिवेश, 10% आबादी, 13% इलाके, 75% लौह भंडार और 26% कोयला फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क और लिथुआनिया को दे दिये गये। जर्मनी की ताकत कम करने के लिए मित्र शक्तियों ने जर्मनी की सेना भंग कर दी। वार गिल्ट क्लॉज के अनुसार जर्मनी द्वारा 6 बिलियन पाउंड की राशि भी अदा की जानी थी। 1920 के दशक के अधिकांश हिस्से में संसाधन से संपन्न राइनलैंड पर मित्र सेना का कब्जा था। इन बातों के कारण, जर्मनी के अधिकतर लोग वाइमर गणराज्य से खुश नहीं थे।


युद्ध का असर

युद्ध के पहले यूरोप कर्ज दिया करता था लेकिन युद्ध के बाद यूरोप कर्जदार बन गया। पुराने साम्राज्य की गलतियों का मुआवजा वाइमर गणराज्य को चुकता करना पड़ रहा था। अब रुढ़िवादी लोग वाइमर के समर्थकों पर तरह तरह से हमले कर रहे थे।

सेना का महिमामंडन: प्रथम विश्व युद्ध के बाद पूरे यूरोप में सैनिकों को आम आदमियों से ऊँचा दिखाया जाता था। राजनेता और मीडिया मिलकर सैनिक के जीवन का गुणगान करते थे। आक्रामक फौजी प्रचार और राष्ट्रिय सम्मान की बात को सार्वजनिक बहसों का हिस्सा बनाया जाने लगा। बताया जाता था कि खंदक में सैनिकों की जिंदगी रोमांचक होती थी। लेकिन सैनिकों को खंदक में लाश खाने वाले चूहों का सामना करना पड़ता था और अपने सामने अपने साथियों की मौत का दुख झेलना पड़ता था। लोकतंत्र की जड़ें अभी ठीक से जमीं नहीं थीं इसलिए यह युद्ध से पीड़ित यूरोप पर मरहम लगाने में नाकाम हो रहा था।

राजनैतिक रैडिकलवाद और आर्थिक संकट

जर्मनी में उस समय रूस के बोल्शेविक क्रांति की तर्ज पर स्पार्टाकिस्ट लीग क्रांति शुरु हुई थी। बर्लिन की राजनैतिक हवा गर्म थी और लोग सोवियत जैसी सरकार की माँग कर रहे थे। एक लोकतांत्रिक गणराज्य को मूर्त रूप देने के उद्देश्य से वाइमर में समाजवादी, लोकतांत्रिक और कैथोलिक लोगों की बैठक हुई। स्पार्टाकिस्ट क्रांति को पुराने सैनिकों की फ्री कॉर्प्स नामक संगठन की सहायता से कुचल दिया गया। उसके बाद स्पार्टाकिस्ट के नेताओं ने कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ जर्मनी की स्थापना की।

1923 के आर्थिक संकट ने जर्मनी के रैडिकलवादियों को और बल दिया। युद्ध से संबंधित हर्जाने को भरने के लिए जर्मनी को स्वर्ण मुद्रा देनी पड़ी थी, जिससे वहाँ का सोने का भंडार बहुत कम हो चुका था। जब 1923 में जर्मनी ने हर्जाना देने से इनकार कर दिया दो फ्रांस ने जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्र रुर पर कब्जा कर लिया। उस क्षेत्र में कोयले का बड़ा भंडार था। इसके जवाब में जर्मनी ने बड़े पैमाने पर नोट छापना शुरु कर दिया। बाजार में अत्यधिक करेंसी आने से जर्मनी में हाइपर इंफ्लेशन (अति मुद्रा स्फीति) की समस्या खड़ी हो गई। जब चीजों के दाम बहुत तेजी से बढ़ते हैं तो ऐसी स्थिति को हाइपर इंफ्लेशन कहते हैं।

अमेरिका ने जर्मनी को इस स्थिति से उबारने की पहल शुरु की। अमेरिका ने डाव्स योजना लागू की। उस योजना के मुताबिक, जर्मनी पर वित्तीय बोझ कम करने के लिए हर्जाने की शर्तों में बदलाव किये गये।


मंदी के साल

1924 से 1928 के बीच हालत में कुछ सुधार हुआ था। लेकिन यह अधिक दिनों तक चलने वाला नहीं था क्योंकि जर्मनी अल्पकालिक कर्जे पर आश्रित था। अधिकतर कर्ज अमेरिका से आया था। जैसे ही वाल स्ट्रीट का शेयर बाजार लुढ़का कर्ज की राशि खींच ली गई। 1929 में वाल स्ट्रीट के शेयर बाजार के लुढ़कते ही लोगों ने धड़ाधड़ शेयर बेचने शुरु कर दिये। इसके साथ ही महामंदी की शुरुआत हो गई। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मंदी का असर पूरी दुनिया पर प‌ड़ा।

महामंदी का सबसे बुरा असर जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था। 1929 की तुलना में 1932 में औद्योगिक उत्पादन 40% रह गया। बेरोजगारों की संख्या 60 लाख पहुँच गई। बेरोजगारी के कारण अपराध भी बढ़ने लगे।

नाजुक गणतंत्र: वाइमर गणराज्य राजनैतिक रूप से बहुत नाजुक था। इसके संविधान में कई खामियाँ थीं जिनके कारण अस्थिरता और तानाशाही का खतरा बना हुआ था। आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुच्छेद का मतलब था कि किसी भी एक पार्टी के लिए बहुमत प्राप्त करना असंभव था। इसलिए गठबंधन सरकारों का बोलबाला रहता था। अनुच्छेद 48 ने राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया था कि वह एक अध्यादेश लाकर आपातकाल लगा सकता था और लोगों के नागरिक अधिकार समाप्त कर सकता था। इसलिए यह दौर राजनैतिक अस्थिरता का था। इस दौरान एक मंत्रिमंडल का औसत कार्यकाल 239 दिनों का था और कई बार आपातकाल लगाया गया था। वाइमर गणराज्य पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा था।



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