यूरोप में समाजवाद

लिबरल, रैडिकल और कंजर्वेटिव

लिबरल या उदारवादी: ऐसे लोग समाज में कई तरह के बदलाव लाना चाहते थे। वे हर धर्म का सम्मान करना चाहते थे। वे जन्म के आधार पर मिलने वाले अधिकारों और सत्ता के खिलाफ थे और व्यक्ति के अधिकारों की वकालत करते थे। वे चुने हुए प्रतिनिधियों वाली एक लोकतांत्रिक सरकार चाहते थे। वैसी सरकार जिसकी समीक्षा एक प्रशिक्षित और स्वतंत्र न्यापालिका कर सके। लेकिन लिबरल लोगों के कुछ विचार लोकतांत्रिक नहीं थे। वह सार्वभौमिक मताधिकार के खिलाफ थे और चाहते थे कि केवल उन्हीं पुरुषों को मताधिकार मिले जिनके पास संपत्ति हो।

रैडिकल: ये लोग लिबरल से थोड़े अलग थे। रैडिकल लोग महिलाओं के लिए भी मताधिकार का समर्थन करते थे। ये धनी जमींदारों और फैक्ट्री मालिकों के अधिकारों के खिलाफ थे। वे निजी संपत्ति के खिलाफ नहीं थे लेकिन कुछ मुट्ठी भर हाथों में संपत्ति के हक के विरोधी थे।


कंजर्वेटिव या रुढ़िवादी: ऐसे लोग पुरानी व्यवस्था को जस का तस बनाए रखने की वकालत करते थे। लेकिन फ्रांसीसी क्रांति के बाद उनका रवैया बदल रहा था। वे बदलाव चाहते थे लेकिन धीमी गति में और साथ में पुरानी संस्थाओं को बचाकर रखना चाहते थे।

औद्योगिक समाज

औद्योगीकरण का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। अब बड़ी संख्या में लोग कारखानों में काम कर रहे थे। हर दिन के हिसाब से काम के घंटे लंबे थे और मजदूरी कम मिलती थी। बेरोजगारी की समस्या आम बात थी। शहरों के विस्तार के साथ साथ मकान और गंदगी की समस्या बढ़ने लगी।

लिबरल और रैडिकल में से ज्यादातर लोगों के पास संपत्ति थी और फैक्ट्रियाँ थीं। वे चाहते थे कि औद्योगीकरण का लाभ मजदूरों को भी मिले। उनका मानना था कि स्वस्थ और शिक्षित नागरिक किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद होते हैं। कुछ लिबरल और रैडिकल की इच्छा थी कि यूरोप में 1815 में बनने वाली हर तरह की सरकारें समाप्त हो जायें|


यूरोप में समाजवाद का आगमन

समाजवाद एक क्रांतिकारी आइडिया था जिसमें निजी संपत्ति को समाप्त करने और एक वर्गविहीन समाज की कल्पना थी। जिस समाज में ऊँच नीच का भेद पूरी तरह से समाप्त हो जाये उसे वर्गविहीन समाज कह सकते हैं। समाजवादियों को लगता था कि निजी संपत्ति ही समाज के सभी समस्याओं की जड़ में है। उनका मानना था कि पूँजीपति केवल अपने मुनाफे के बारे में सोचता है और उसे मजदूरों के कल्याण से कोई सरोकार नहीं होता है।

कुछ समाजवादियों को को-ऑपरेटिव (सहकारी) के सिद्धांत पर भरोसा था। कुछ को लगता था कि आम आदमी से बड़े स्तर पर को-ऑपरेटिव बनाना असंभव है इसलिए सरकार से इसके लिए मदद मिलनी चाहिए।

कार्ल मार्क्स (1818—1883) का मानना था कि मजदूरों को को-ऑपरेटिव सोसाइटी बनाकर जमीन और फैक्ट्री की कमान अपने हाथ में लेनी चाहिए। मार्क्स को लगता था कि पूँजीवाद की समस्याओं से छुटकारा पाने का यही एक रास्ता है। फ़्रेडरिक एंगेल्स (1820-1895) ने भी समाजवाद के सिद्धांत में अपने आइडिया दिए।

समाजवाद के लिए समर्थन

1870 के दशक तक समाजवाद का आइडिया पूरे यूरोप में फैल गया। इस दिशा में चलने वाले हर प्रयास को बेहतर ढ़ंग से करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था बनाई गई, जिसका नाम था सेकंड इंटरनेशनल।

इंग्लैंड और जर्मनी के मजदूरों ने अपने संगठन बनाने शुरु किए ताकि उन्हें रहने और काम करने के लिए बेहतर माहौल मिल सके। मुसीबत में अपने सदस्यों की मदद के लिए उन्होंने फंड भी बनाये। वे काम के घंटे कम करने और वोटिंग राइट की माँग कर रहे थे। इन संगठनों ने जर्मनी के सोशलिस्ट डेमोक्रैटिक पार्टी (SPD) के साथ मिलकर काम किया जिसके कारण उस पार्टी को पार्लियामेंट के चुनाव में सीटें भी मिलीं। इसी तरह 1905 तक ब्रिटेन में लेबर पार्टी और फ्रांस में सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ। लेकिन 1914 तक यूरोप में कहीं भी समाजवादियों की सरकार नहीं बन पाई थी।



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