अवस्था में परिवर्तन

तापमान का प्रभाव:

जब किसी ठोस का तापमान बढ़ाया जाता है तो उसके कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है। गतिज ऊर्जा बढ़ने के कारण कण तेजी से कंपन करने लगते हैं। जब ऊर्जा इतनी अधिक हो जाती है कि कण आपस के आकर्षण बल को पार कर जाते हैं तो एक दूसरे से अलग होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में पदार्थ अपनी ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में चला जाता है। ठोस के गैस में बदलने की प्रक्रिया को संगलन कहते हैं। जिस न्यूनतम तापमान पर कोई ठोस द्रव में बदल जाता है उसे उस ठोस का गलनांक कहते हैं।

जब किसी ठोस गर्म किया जाता है तो उसका तापमान बढ़ने लगता है। लेकिन जब ठोस गलने लगता है उस समय उसके तापमान में कोई परिवर्तन नहीं होता है। ऐसे समय में जो भी अतिरिक्त ऊष्मा मिलती है उसका इस्तेमाल ठोस को द्रव में बदलने के लिये किया जाता है। इसलिए संगलन के समय तापमान में कोई परिवर्तन नहीं होता है।


संगलन की प्रसुप्त ऊष्मा: वायुमंडलीय दाब पर 1 किग्रा ठोस को उसके गलनांक पर द्रव में बदलने के लिये जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है उस ऊष्मा को उस ठोस के संगलन की प्रसुप्त ऊष्मा कहते हैं।

जब किसी द्रव को गर्म किया जाता है तो उसके कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ जाने के कारण एक दूसरे से दूर होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में पदार्थ अपनी द्रव अवस्था से गैसीय अवस्था में चला जाता है।

क्वथनांक: वायुमंडलीय दबाव पर वह तापमान जिसपर किसी द्रव का वाष्पीकरण शुरु हो जाता है उस द्रव का क्वथनांक कहलाता है।

वाष्पीकरण की प्रसुप्त ऊष्मा: वायुमंडलीय दाब पर 1 किग्रा जल को उसके क्वथनांक पर वाष्प में बदलने के लिए जरूरी ऊष्मा को जल के वाष्पीकरण की प्रसुप्त ऊष्मा कहते हैं।

ऊर्ध्वपातन: जब कोई ठोस (द्रव अवस्था में गये बिना) सीधे गैस बन जाता है तो इस प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं। यानि गैस से सीधे ठोस में बदलने की प्रक्रिया को भी ऊर्ध्वपातन कहते हैं। उदाहरण: अमोनियम क्लोराइड तथा कपूर को खुले में छोड़ देने से उनका ऊर्ध्वपातन हो जाता है। ऐसा ही ठोस कार्बन डाइऑक्साइड के साथ होता है।

दाब परिवर्तन का प्रभाव: जब किसी गैस पर दाब बढ़ाया जाता है वह द्रव अवस्था में चली जाती है। इसी तरह जब किसी द्रव पर दाब बढ़ाया जाता है तो वह ठोस अवस्था में चला जाता है।


वाष्पीकरण:

आपने पढ़ा कि पदार्थ के कण हमेशा गतिशील रहते हैं। द्रवों में सतह पर के कणों की गतिज ऊर्जा इतनी होती है कि वे एक दूसरे के आकर्षण बल से मुक्त हो जाते हैं, जिसके कारण वे गैस में बदल जाते हैं। क्वथनांक से कम तापमान पर द्रव के इस तरह से गैस में बदलने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं। इसे कभी कभी वाष्पीभवन भी कहते हैं। अंग्रेजी भाषा में vaporization और evaporation दो अलग-अलग शब्द हैं जिनके अर्थ भी अलग-अलग होते हैं। लेकिन हिंदी भाषा में दोनों परिघटनाओं के लिए अक्सर एक ही शब्द वाष्पीकरण का इस्तेमाल होता है।

वाष्पीकरण को प्रभावित करने वाले कारक

तापमान: तापमान बढ़ने पर वाष्पीकरण की गति तेज होती है, क्योंकि तापमान बढ़ने से कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है।

सतह क्षेत्र: सतह क्षेत्र बढ़ने पर वाष्पीकरण की गति तेज होती है, क्योंकि बड़े सतह क्षेत्र में द्रव के और अधिक कण सतह पर आ जाते हैं।

आर्द्रता: वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। जब आर्द्रता अधिक होती है तो वायु में अतिरिक्त जलवाष्प के लिए जगह नहीं बचती है। इसलिए आर्द्रता घटने पर वाष्पीकरण की गति बढ़ जाती है जबकि आर्द्रता बढ़ने पर इसका उलटा होता है।

वायु की गति: वायु की गति बढ़ने से जलवाष्प के कण दूर उड़ा दिये जाते हैं। इसलिए वायु की गति बढ़ने से वाष्पीकरण की गति तेज हो जाती है।

राशिमात्रकप्रतीक
तापमानकेल्विनK
लंबाईमीटरm
संहतिकिलोग्रामkg
भारन्यूटनN
आयतनघन मीटरm3
घनत्वकिलोग्राम प्रति घन मीटरkg m-3
दाबपास्कलPa


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