खाद्य संसाधन

खाद्य संसाधनों में सुधार की जरूरत क्यों है?

जनसंख्या के मामले में भारत एक विशाल देश है जहाँ 130 करोड़ लोग रहते हैं। इतने लोगों का पेट भरने के लिए खाद्य उत्पादन को बढ़ाते रहने की जरूरत है। पहले से ही यहाँ के भूभाग के एक बड़े से हिस्से पर खेती होती रही है इसलिए खेती लायक जमीन का क्षेत्रफल तो हम बढ़ा नहीं सकते हैं। इसलिए ऐसे उपाय लगाने होंगे ताकि खेती से होने वाली पैदावार को कई गुना बढ़ा दिया जाए।

खाद्य सुरक्षा: 1996 के वर्ल्ड फूड समिट के अनुसार, जब लोगों को अपनी रुचि और जरूरत के अनुसार पोषक और सुरक्षित भोजन समुचित मात्रा में हमेशा मिलता रहे तो ऐसी स्थिति को खाद्य सुरक्षा कहते हैं। इस परिभाषा में भोजन की उपलब्धता की बात की गई है और साथ में यह भी कहा गया है कि हर व्यक्ति के पास भोजन उपलब्ध हो। इस परिभाषा में भोजन के सुरक्षित और पोषक होने की बात भी की गई है और यह भी कहा गया है हर वर्ग के व्यक्ति में उसे खरीदने की हैसियत हो।


भारत में कृषि उत्पादन में सुधार

1952 की तुलना में 2010 तक खेती की भूमि में 25% की वृद्धि हुई। इसी अवधि में कृषि पैदावार चार गुनी हो गई। यह सब कृषि उत्पादन के क्षेत्र में कई सुधारों के कारण संभव हो पाया। फसल उत्पादन में सुधार की गतिविधियों को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है।

फसल की किस्मों में सुधार

इसके लिए विभिन्न उपयोगी गुणों के आधार पर फसल की किस्मों का चयन किया जाता है। ऐसा प्रजनन के द्वारा किया जा सकता है। जैसे कि आम के लिए बड़े फल एक उपयोगी गुण हो सकता है। किसी ऐच्छिक गुण को संकरण द्वारा भी फसल में डाला जा सकता है।

संकरण: जब विभिन्न आनुवंशिक गुणों वाले जीवों के बीच प्रजनन कराया जाता है तो इसे संकरण कहते हैं। संकरण तीन प्रकार के होते हैं।

  1. अंतरा-किस्मीय: एक ही स्पेशीज की विभिन्न किस्मों के बीच होने वाला संकरण।
  2. अंतरा-स्पेशीज: एक ही जीनस की दो विभिन्न स्पेशीज के बीच होने वाला संकरण।
  3. अंतरा-वंशीय: विभिन्न जेनेरा के बीच होने वाला संकरण।

इसके अलावा, जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा भी किसी ऐच्छिक गुण को एक फसल में डाला जा सकता है।

किस्मों में सुधार के कारक

उच्च उत्पादन: इसका मतलब है प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाना।

उन्नत किस्में: अलग-अलग फसल के लिए उन्नत किस्म के अलग अलग अर्थ होते हैं। जैसे दाल में अधिक प्रोटीन का होना और धान में अधिक कार्बोहाइड्रेट का होना। तेलहन वाली फसल में तेल की अधिक मात्रा और गुणवत्ता ही अच्छी किस्म की निशानी है।

जैविक तथा अजैविक प्रतिरोधकता: फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले जैविक कारकों के उदाहरण हैं: रोग, कीट, निमेटोड, आदि। फसल को कई अजैविक कारकों से भी हानि होती है, जैसे सूखा, क्षारता, जलाक्रांति, गर्मी, पाला, आदि। जो फसल इन परिस्थितियों को सहन कर सकती है उससे उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।

परिपक्वन काल: पहले आम के पेड़ को परिपक्व होकर फल लगने में पाँच वर्ष से अधिक लगते थे। अब नई किस्मों के पेड़ तीन वर्ष में ही फल देने लगते हैं। परिपक्वन काल कम हो जाने से किसान को कम समय में ही मुनाफा हो सकता है।

व्यापक अनुकूलता: भारत के अलग-अलग भागों में अलग-अलग प्रकार की जलवायु है। यदि कोई फसल हर तरह की परिस्थिति में लहलहा सकती है तो इससे यह लाभ होता है कि एक ही किस्म को विभिन्न जलवायु में उगाया जा सकता है।

ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण: फसल के जो गुण हमारे लिए लाभदायक हों उन्हें ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण कह सकते हैं। गन्ने की लंबाई जितनी अधिक होगी उसमें से उतना ही अधिक रस निकलेगा। इसलिए गन्ने के मामले में ऐच्छिक सस्य गुण उसके तने की लंबाई और मोटाई है। धान का पौधा यदि कम ऊँचाई का होगा तो उसके तने और पत्तियों की वृद्धि में कम पोषक की आवश्यकता होगी। ऐसे में अधिक से अधिक पोषक तत्वों का इस्तेमाल धान के बीजों के बनने में होगा।


फसल उत्पादन प्रबंधन

पोषक प्रबंधन

पादप को सही वृद्धि के लिए समुचित पोषक पदार्थों की जरूरत पड़ती है और ये सारे पोषक उन्हें मिट्टी से मिलते हैं। जब किसी खेत पर कई बार फसल काट ली जाती है तो वहाँ की मिट्टी में से पोषक तत्व समाप्त होने लगते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरकता कम हो जाती है या समाप्त हो जाती है। इसलिए मिट्टी की उर्वरकता वापस लाने के लिए किसानों को कई उपाय करने पड़ते हैं, जैसे की खाद या उर्वरक डालना।

खाद: जैविक कचरे से खाद बनाई जाती है। खाद में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है। खाद बनाने की दो विधियाँ हैं।

  1. कम्पोस्टिंग: इसके लिए जैविक कचरे (खर पतवार, गोबर, पत्तियाँ, छिलके, आदि) को एक बड़े से गड्ढ़े में डालकर उस गड्ढ़े के ऊपर मिट्टी की एक परत चढ़ा दी जाती है। समय बीतने के बाद उन पदार्थों का निरस्तीकरण हो जाता है जिससे खाद तैयार होती है। इस प्रक्रिया को कम्पोस्टिंग कहते हैं। जब निरस्तीकरण की प्रक्रिया की रफ्तार बढ़ाने के लिए केंचुओं की मदद ली जाती है तो इसे वर्मीकम्पोस्टिंग कहते हैं।
  2. हरी खाद: हरे पौधों के निरस्तीकरण से बनने वाली खाद को हरी खाद कहते हैं। फसल लगाने से पहले किसान खेतों में पटसन, मूँग या ग्वार उगाते हैं। बाद में इन फसलों को हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। निरस्तीकरण के बाद ये पौधे खाद में बदल जाते हैं।

खाद के लाभ: कम्पोस्ट में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक होती है। इससे मिट्टी की संरचना अच्छी होती है। रेतीली मिट्टी में खाद मिलाने से मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है। चिकनी मिट्टी में खाद मिलाने से उस मिट्टी में पानी अधिक देर तक जमा नहीं होता। खाद बनाने से जैविक कचरे का सही तरीके से निपटारा होता है जिससे पर्यावरण को लाभ होता है।

खाद की कमियाँ: खाद में पोषक तत्वों की मात्रा कम होती है। खाद बनाने में काफी लंबा समय लगता है और इसके लिए जमीन की भी जरूरत पड़ती है। खाद को अपना असर दिखाने में अधिक समय लगता है।

उर्वरक

व्यावसायिक रूप से बनने वाले पादप पोषक को उर्वरक कहते हैं। उर्वरक से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम मिलते हैं। इनसे पादप की कायिक वृद्धि में मदद मिलती है।

उर्वरक के लाभ: उर्वरक का असर बहुत जल्दी दिखता है। इसके इस्तेमाल से किसानों को जल्दी मुनाफा होता है।

उर्वरक के नुकसान: उर्वरक के अधिक इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना खराब हो जाती है। सिंचाई के पानी के साथ बहकर उर्वरक नदियों के जल और भौमजल को प्रदूषित कर देता है। उर्वरक का इस्तेमाल पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होता है।

कार्बनिक खेती: इस प्रकार की खेती में उर्वरक, कीटनाशक, पीड़ानाशक, आदि का इस्तेमाल नगण्य या बिलकुल नहीं होता है। कार्बनिक खेती में कम्पोस्ट का इस्तेमाल होता है। इसके लिए फसल चक्र, अंत:फसलीकरण और मिश्रित खेती का उपयोग किया जाता है। पर्यावरण और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कार्बनिक खेती अति उत्तम है।



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