फ्रांसीसी क्रांति

आतंक राज (1793 से 1794)

मैक्समिलियन रोबेस्पिएर बड़ा ही कठोर शासक साबित हुआ। वह अपने हर विरोधी को मौत की सजा देता था चाहे वह उसकी पार्टी का सदस्य ही क्यों न हो। डॉ. गिलोटीन ने सिर को धड़ से अलग करने के लिए एक भयानक मशीन का आविष्कार किया था जिसे गिलोटीन का नाम दिया गया। इस मशीन में दो खंभे होते थे और एक बड़ी सी आरी होती थी। जिसे मौत की सजा होती थी उसका सिर धड़ से अलग करने के लिए गिलोटीन का इस्तेमाल होता था।

रॉबेस्पिएर की सरकार ने कई नये नियम बनाए जिनमें अधिकतम वेतन की सीमा तय की गई, चीजों के दाम तय हुए और कई सामान की राशनिंग की गई। किसानों को अब एक तय कीमत पर शहर में जाकर अनाज बेचना पड़ता था। सफेद आटे (जो महंगा था) पर प्रतिबंध लग गया और सबके लिए समता रोटी खाना अनिवार्य कर दिया गया। पुरुषों और स्त्रियों के परंपरागत संबोधन मॉस्यूर और मदाम के स्थान पर अब सितोयेन और सितोयीन शब्दों का इस्तेमाल करना होता था। चर्चों को बंद कर दिया गया और उनकी इमारतों को दफ्तरों और बैरकों में तब्दील कर दिया गया।

रॉबेस्पिएर के क्रूर नियमों के कारण उसके समर्थक भी त्राहि त्राहि करने लगे। आखिरकार जुलाई 1794 में रॉबेस्पिएर को गिलोटीन पर चढ़ा दिया गया। इस तरह से आतंक के शासन का अंत हुआ।


डिरेक्ट्री शासित फ्रांस

जैकोबिन के पतन के बाद एक नये संविधान को लागू किया गया और फिर से सत्ता मध्यम वर्ग के हाथों में आ गई। इस नये संविधान के अनुसार

डिरेक्ट्री और काउंसिल के बीच अक्सर टकराव होने से राजनैतिक अस्थिरता आ जाती थी। इससे नेपोलियन बोनापार्ट नामक मिलिट्री तानाशाह के लिए दरवाजे खुलने लगे थे। 1804 में नेपोलियन फ्रांस का बादशाह बना।

महिलाओं की क्रांति

क्रांति के बावजूद महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं मिला और समाज में उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। समाज में अपनी पहचान बनाने के उद्देश्य से महिलाओं ने फ्रांस के विभिन्न शहरों में लगभग 60 क्लबों की स्थापना की। उनमें से सबसे मशहूर क्लब का नाम था द सोसायटी ऑफ रिवोल्यूशनरी एंड रिपब्लिकन विमेन। महिलाएँ पुरुषों के समान राजनैतिक अधिकार की माँग करती थीं। लेकिन 1791 के संविधान ने उन्हें निष्क्रिय नागरिक की श्रेणी में रखकर उन्हें निराश ही किया था।

अधिकतर महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था। कुलीन और अमीर घरों की महिलाएँ कॉन्वेंट में पढ़ती थीं। पढ़ाई के बाद उनके परिवार वाले उनकी शादी करा देते थे चाहे उनकी मर्जी हो या न हो। तीसरे इस्टेट की महिलाओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। वे घर चलाने के लिए फूल, फल या सब्जियाँ बेचती थीं। कुछ महिलाएँ दूसरे के घरों में चौका बरतन का काम करती थीं। इसके अलावा महिलाओं को अपने घर में भोजन पकाना पड़ता था और परिवार की देखभाल करनी पड़ती थी। आतंक के शासन के दौर महिलाओं के कई क्लब बंद किये गये थे और कई महिलाओं को जेल में डाल दिया गया था।

समय बीतने के साथ क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए कई कानून बनाए। कई सरकारी स्कूल बनाए गए और स्त्री शिक्षा को अनिवार्य किया गया। लड़की की मर्जी के बगैर शादी पर प्रतिबंध लगा, तलाक को कानूनी दर्जा दिया गया और अब तलाक की अर्जी पुरुष या स्त्री कोई भी लगा सकता था। महिलाएँ अपनी मर्जी के अनुसार किसी भी हुनर के लिए ट्रेनिंग ले सकती थीं। लेकिन वोट के अधिकार के लिए महिलाओं अगले दो सौ वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा। आखिरकार, फ्रांस की महिलाओं को 1946 में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ।


दास प्रथा का उन्मूलन

दास प्रथा एक बुरी प्रथा थी जिसमें लोगों को उनकी मर्जी के खिलाफ काम करने को बाध्य किया जाता था और उन्हें किसी सामान की तरह बेचा और खरीदा जाता था। दासों का व्यापार सत्रहवीं सदी में शुरु हुआ था। फ्रांस के व्यापारी मुख्य रूप से अफ्रिका से दास खरीदते थे। दासों को तपते लोहे से दाग कर उनपर मार्का बनाया जाता था, उन्हें जंजीरों में जकड़ा जाता था और फिर जहाजों में ठूंसकर अतलांतिक के पार कैरेबियन द्वीपों पर भेजा जाता था। इस समुद्री यात्रा में दो से तीन महीने लगते थे। कैरेबियन द्वीपों पर गन्ने, कॉफी और नील की खेती की जाती थी ताकि यूरोप की माँग को पूरा किया जा सके। बोर्दे और नांते जैसे बंदरगाह दास व्यापार के कारण ही फलते फूलते शहर बन गये।

फ्रांस में दास प्रथा की आलोचना होने लगी। लेकिन दास व्यापार में शामिल व्यवसायियों के डर से नेशनल एसेंबली इस मामले पर कोई भी कानून लाने से बचती थी। जब जैकोबिन के हाथों में सत्ता आई तो उन्होंने फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन नेपोलियन ने दोबारा इस प्रथा को शुरु कर दिया। अंत में 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों से दास प्रथा समाप्त हुई।

निष्कर्ष

आधुनिक इतिहास में फ्रांसीसी क्रांति को एक अनूठी घटना के रूप में देखा जाता है। फ्रांसीसी क्रांति का दूरगामी प्रभाव न केवल फ्रांस के समाज पर बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ा। आज लोकतंत्र के जिस रूप को हम जानते हैं उसकी जड़ें फ्रांस में ही पनपी थीं। आज हम राष्ट्रों के जिस रूप को जानते हैं उसकी शुरुआत फ्रांसीसी क्रांति के साथ हुई थी। उपनिवेशों में राष्ट्रवादी आंदोलनों पर फ्रांसीसी क्रांति का गहरा प्रभाव था।



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