फसल उत्पादन एवं प्रबंधन

सिंचाई:

पादपों को सही तरह से बढ़ने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। किसान समय समय पर फसल में पानी डालता है और इस काम को सिंचाई कहते हैं। पानी की जरूरत फसल और मौसम के हिसाब से बदलती रहती है। खरीफ की फसल को अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। सिंचाई के लिए पानी के अहम स्रोत हैं: कुँआ, नलकूप, पोखर, तालाब, झील, नदी, नहर, आदि।

सिंचाई के पारंपरिक साधन: सिंचाई के पारंपरिक तरीकों में इंसान या मवेशी के श्रम का इस्तेमाल होता है।

(a) मोट (चरखी): मोट में एक चरखी और एक रस्सी लगी होती है। रस्सी के एक सिरे पर बाल्टी बंधी होती है। पानी खींचने के लिए रस्सी के दूसरे सिरे को चरखी के ऊपर खींचा जाता है।


(b) चेन पंप: चेन पंप में एक पहिया लगा होता है जिसे एक जंजीर की मदद से घुमाया जाता है। जंजीर के साथ कई गोल चक्के लगे होते हैं। चेन के साथ ये गोले आगे बढ़ते हैं और पानी ऊपर आता है।

(c) ढ़ेकली: यह लकड़ी के एक लंबे बीम से बनी होती है जिसे एक लीवर की सहायता से ऊपर नीचे किया जाता है। ढ़ेकली के लंबे सिरे पर बाल्टी लगी होती है। ढ़ेकली के छोटे सिरे को पैर से दबाने से पानी ऊपर आता है।

(d) रहट: यह पर्सिया से आया था इसलिए इसे पर्सियन व्हील भी कहते हैं। इसमें एक विशाल पहिया होता है जिसके किनारों पर बाल्टियाँ लगी होती हैं। रहट को मवेशी की मदद से घुमाया जाता है जिससे पानी ऊपर आता है।

इंसान या मवेशी की शक्ति से चलने वाले पंप बहुत धीमे काम करते हैं। अब इनकी जगह मोटर से चलने वाले पंप का इस्तेमाल होने लगा है। ऐसे मोटर को बिजली या डीजल इंजन से पावर मिलता है।


सिंचाई के आधुनिक साधन

स्प्रिंकलर सिस्टम: इस सिस्टम में पाइपों की एक सीरीज होती है। समुचित दूरी पर पाइप में लम्बवत (खड़े) स्प्रिंकलर लगे होते हैं। स्प्रिंकलर का नोजल घूमता रहता है जिससे पानी वर्षा की फुहार की तरह पौधों पर गिरता है। ऊबर खाबड़ जमीन के लिए स्प्रिंकलर सिस्टम कारगर साबित होता है।

ड्रिप इरिगेशन: इस सिस्टम में पौधों की कतारों के साथ साथ पाइप बिछाई जाती है। इन पाइपों में थो‌ड़ी थोड़ी दूरी पर छेद होते हैं। इन छेदों से पानी रिस रिस कर पौधों की जड़ों पर पड़ता है। जिन स्थानों पर पानी की किल्लत होती है वहाँ के लिए यह एक कारगर सिस्टम है।

सिंचाई का महत्व



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