किशोरावस्था की ओर

किशोरावस्था: जीवन के जिस दौर में शरीर में ऐसे बदलाव होते हैं जिनसे व्यक्ति जनन परिपक्वता प्राप्त करता है, उस दौर को किशोरावस्था कहते हैं। किशोरावस्था की शुरुआत 10 वर्ष की आयु में होती है और यह अवस्था 18 से 19 वर्ष की आयु तक चलती है।

टीनएज: किशोरावस्था के समय के वर्षों को अंग्रेजी के thirteen, fourteen, fifteen, आदि से लिखा जाता है। आप गौर करेंगे कि वर्षों के इन नामों का अंत टीन (TEEN) से होता है। इसलिए जीवन के इस दौर को टीनएज भी कहते हैं।

यौवनारंभ (Puberty): किशोरावस्था के दौरान होने वाले बदलावों की प्रक्रिया को यौवनारंभ कहते हैं। यौवनारंभ के शुरु होते ही किशोरावस्था शुरु हो जाती है। किशोरावस्था के समाप्त होते ही जनन परिपक्वता आ जाती है।


किशोरावस्था के बदलाव

लंबाई में वृद्धि: किशोरावस्था में सबसे साफ दिखाई देने वाला बदलाव होता है लंबाई में वृद्धि। इस आयु में शरीर की लंबी हड्डियाँ बड़ी तेजी से बढ़ती हैं, जिसके कारण लंबाई तेजी से बढ़ती है। शुरु में लड़कों की तुलना में लड़कियाँ तेजी से बढ़ती हैं, लेकिन आमतौर पर लड़कों की लंबाई लड़कियों से अधिक होती है। 18 वर्ष की आयु आने तक हर व्यक्ति अपनी पूरी लंबाई पा लेता है।

आकृति में बदलाव: लड़कों की पेशियाँ अधिक स्पष्ट हो जाती हैं। उनके कंधे चौड़े हो जाते हैं और कमर पतली हो जाती है। लड़कियों के कंधे पतले रहते हैं लेकिन कमर के नीचे का हिस्सा चौड़ा हो जाता है।

आवाज में बदलाव: लड़कों की आवाज भारी हो जाती है। कभी कभी कुछ दिनों के लिए आवाज फट जाती है जो कुछ दिनों के बाद सामान्य हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि लड़कों के स्वरयंत्र में वृद्धि होती है। लड़कियों की आवाज पतली, यानि ऊँचे पिच वाली हो जाती है।

एडम्स एप्पल (कंठ मणिका): स्वरयंत्र जब बड़ा हो जाता है तो यह गर्दन में एक उभार के रूप में दिखने लगता है। इस उभार को एडम्स एप्पल कहते हैं।

स्वेद और तैल ग्रंथियों की क्रियाशीलता: किशोरावस्था के दौरान स्वेद ग्रंथियाँ और तैल ग्रंथियाँ अधिक सक्रिय हो जाती हैं। इस के कारण, कई किशोरों को मुहासे और एक्ने (सिहुली) की समस्या हो सकती है।

जननांगों का विकास: लड़कों का वृषण शुक्राणु बनाना शुरु कर देता है। वृषण और शिश्न का विकास पूरा हो जाता है। लड़कियों के अंडाशय बड़े हो जाते हैं और अंडाणु परिपक्व होने शुरु हो जाते हैं। अंडाशय से परिपक्व अंडाणु का निर्मोचन शुरु हो जाता है।

मानसिक, बौद्धिक एवं भावनात्मक परिपक्वता: किशोरावस्था के दौरान शरीर में होने वाले बदलावों का असर व्यक्ति की सोच पर भी पड़ता है। किशोरवय का व्यक्ति अब सोचने में अधिक समय बिताता है और अपने बारे में अधिक जागरूक हो जाता है। कई किशोरवय व्यक्तियों में असुरक्षा की भावना भी भर जाती है।

गौण लैंगिक लक्षण

जिन लक्षणों के कारण नर और मादा में भिन्नता दिखाई देती है उन्हें गौण लैंगिक लक्षण कहते हैं। लड़कों में गौण लैंगिक लक्षण: चेहरे पर दाढ़ी मूँछ, भारी आवाज और छाती पर बाल

लड़कियों में गौण लैंगिक लक्षण: स्तनों का बड़ा होना और पतली आवाज

लड़के और लड़कियों में कुछ समान लक्षण: बगलों में और प्यूबिक क्षेत्र में बाल


हॉर्मोन का नियंत्रण

किशोरवय में होने वाले बदलावों का नियंत्रण हॉर्मोन द्वारा होता है। हॉर्मोन एक तरह के रसायन होते हैं जिनका स्राव अंत:स्रावी ग्रंथियों द्वारा होता है। विभिन्न उपापचयी क्रियाओं में हॉर्मोन की अहम भूमिका होती है।

लड़कों में वृषण से टेस्टोस्टेरोन नाम के हॉर्मोन का स्राव होता है। इस हॉर्मोन के कारण लड़कों में कई बदलाव होते हैं। लड़कियों में अंडाशय से एस्ट्रोजेन नाम के हॉर्मोन का स्राव होता है। यह हॉर्मोन लड़कियों में कई बदलाव लाता है।

इन हॉर्मोन का काम पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा निकलने वाले एक हॉर्मोन द्वारा नियंत्रित होता है। पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा निकलने वाला एक अन्य हॉर्मोन अंडाणु के परिपक्व होने और शुक्राणु के उत्पादन को प्रभावित करता है। बिना ट्यूब की ग्रंथियों को अंत:स्रावी ग्रंथि कहते हैं। इन ग्रंथियों से निकलने वाला स्राव सीधा रक्त से होकर अपने टार्गेट अंग तक पहुँचता है।

लैंगिक हॉर्मोन के अलावा अन्य हॉर्मोन

एंडोक्राइन ग्लैंडहॉर्मोनकार्य
पिट्यूटरीग्रोथ हॉर्मोनशरीर की सामान्य वृद्धि
थायरॉयडथायरॉक्सिनसामान्य मेटाबॉलिज्म
पैंक्रियाजइंसुलिनग्लूकोज मेटाबॉलिज्म
एड्रिनलएड्रिनलिनशरीर को लड़ने या भागने के लिए तैयार करना, यानि विषम परिस्थिति के लिए तैयार करना


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